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हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥ हे नाथ मैँ आपको भूलूँ नही...!! हे नाथ ! आप मेरे हृदय मेँ ऐसी आग लगा देँ कि आपकी प्रीति के बिना मै जी न सकूँ.

Saturday, November 2, 2013

दीपावली महालक्ष्मी पूजन विधि महालक्ष्मी पूजन मुहूर्त

ऊँ श्री लक्ष्मीनारायण नम:
इस वर्ष दीपावली कार्तिक कृष्ण अमावस्या रविवार 3 नवंबर 2013 को सांयकाल सूर्यास्त समय 5 बजकर 45 मिनिट पर से रात्रि में 8 बजकर 20 मिनिट तक स्पष्ट प्रदोषकाल में महालक्ष्मी पूजन का श्रेष्ठ मुहूर्त है।

पूजा के लिए श्रेष्ठ स्थिर लग्न

वृषभ लग्न - समय 18 बजकर 27 मिनट से 20 बजकर 25 मिनट तक
सिंह लग्न - समय रात्रि 24 बजकर 50 मिनट से 27 बजकर 3 मिनट तक

चौघड़िया के अनुसार महालक्ष्मी पूजन मुहूर्त

लाभ एवं अमृत - सुबह 9 बजकर 25 मिनट से 12 बजकर 17 मिनट तक
शुभ - दोपहर 13 बजकर 34 मिनट से 14 बजकर 58 मिनट तक

सांयकाल

शुभ और अमृत - 17 बजकर 45 मिनट से 20 बजकर 58 मिनट तक

यह विशिष्ट मुहूर्त श्री सिद्ध विजय पंचांग उज्जैन के आधार पर दिए गए है इसमें स्थान के अलग अलग सूर्योदय के कारण कुछ मिनटों का अंतर आ सकता है। ऐसे में अपनी सुविधा और कुल परंपरा के अनुसार इन मुहूर्तों में मां महालक्ष्मी का पूजन किया जाना चाहिए।

पूजन में श्रद्धानुसार श्री गणेश, महाकाली, महालक्ष्मी, कुबेर, इंद्र, महासरस्वती के साथ बही, कलम, स्याही, तराजू, देहली का पूजन करना चाहिए। शुभ चिह्न स्वस्तिक, शुभ-लाभ अंकित करना चाहिए।

शास्त्र का कहना है इस दिन लक्ष्मीपूजन के दिन भोजन नहीं करना चाहिए व्रत करना चाहिए, लक्ष्मी पूजन के बाद भोजन करना चाहिए। हालांकि बीमार, बाल, वृद्ध को व्रत करने में छूट दी गई है।

प्रदोष समये लक्ष्मी पूजनानि कृत्वा भोजनं कार्यम्
अत्र दशे बाल वृद्धा दिभिर्न्न दिवा न भोक्तव्यं रात्रों भोक्तव्यम।

दीपावली का महत्व और लक्ष्मी पूजन विधि

प्राचिन काल से हि भारतीय संस्कृति में अनेक पर्व-त्यौहार मनाए जाते हैं। इन त्यौहारों में कार्तिक मास कि अमावस्या को दीपावली का विशेष महत्व हैं। क्योकि दीपावली खुशियों का त्यौहार हैं। दीपावली के दिन भगवान गणेश व लक्ष्मी के पूजन का विशेष महत्व हैं। इस दिन गणेश जी कि पूजा से ऋद्धि-सिद्धि कि प्राप्ति होती हैं एवं लक्ष्मी जी के पूजन से धन, वैभव, सुख, संपत्ति कि प्राप्ति होती हैं। दीपावली के दिन किये जाने वाले मंत्र-यंत्र-तंत्र का प्रयोग अत्यधिक प्रभावी माना जाता हैं।
दीपावली के दिन प्रत्येक व्यवसाय-नौकरी से जुडे व्यक्ति अपने व्यवायीक स्थान एवं घर पर मां लक्ष्मी का विधिवत पूजन कर धन कि देवी लक्ष्मी से सुख-समृद्धि कि कामना करते हैं।
पूजन सामग्री :
महालक्ष्मी पूजन में केसर, कूमकूम, चावल, पान, सुपारी, फल, फूल, दूध, बताशे, सिंदूर, मेवे,
शहद, मिठाइयां, दही, गंगाजल, धूप, अगरबत्तियां, दीपक, रुई, कलावा(मौली), नारियल
और तांबे का कलश।
पूजा की संक्षिप्त विधि-
सबसे पहले पवित्रीकरण करें। आप हाथ में पूजा के जलपात्र से थोड़ा-सा जल ले लें और अब उसे मूर्तियों के ऊपर छिड़कें। साथ में मंत्र पढ़ें। इस मंत्र और पानी को छिड़ककर आप अपने आपको पूजा की सामग्री को और अपने आसन को भी पवित्र कर लें।

ॐ पवित्रः अपवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपिवा।
यः स्मरेत्‌ पुण्डरीकाक्षं स वाह्यभ्यन्तर शुचिः॥
पृथ्विति मंत्रस्य मेरुपृष्ठः ग ऋषिः सुतलं छन्दः
कूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥

अब पृथ्वी पर जिस जगह आपने आसन बिछाया है, उस जगह को पवित्र कर लें और मां पृथ्वी को प्रणाम करके मंत्र बोलें-

ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्‌॥
पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नमः

अब आचमन करें
पुष्प, चम्मच या अंजुलि से एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और बोलिए-
ॐ केशवाय नमः
और फिर एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और बोलिए-
ॐ नारायणाय नमः
फिर एक तीसरी बूंद पानी की मुंह में छोड़िए और बोलिए-
ॐ वासुदेवाय नमः फिर 
ॐ हृषिकेशाय नमः
कहते हुए हाथों को खोलें और अंगूठे के मूल से होंठों को पोंछकर हाथों को धो लें। पुनः तिलक लगाने के बाद प्राणायाम व अंग न्यास आदि करें। आचमन करने से विद्या तत्व, आत्म तत्व और बुद्धि तत्व का शोधन हो जाता है तथा तिलक व अंग न्यास से मनुष्य पूजा के लिए पवित्र हो जाता है।

आचमन आदि के बाद आंखें बंद करके मन को स्थिर कीजिए और तीन बार गहरी सांस लीजिए। यानी प्राणायाम कीजिए क्योंकि भगवान के साकार रूप का ध्यान करने के लिए यह आवश्यक है फिर पूजा के प्रारंभ में स्वस्तिवाचन किया जाता है। उसके लिए हाथ में पुष्प, अक्षत और थोड़ा जल लेकर स्वतिनः इंद्र वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए परम पिता परमात्मा को प्रणाम किया जाता है। फिर पूजा का संकल्प किया जाता है। संकल्प हर एक पूजा में प्रधान होता है।
संकल्प
आप हाथ में अक्षत लें, पुष्प और जल ले लीजिए। कुछ द्रव्य भी ले लीजिए। द्रव्य का अर्थ है कुछ धन। ये सब हाथ में लेकर संकल्प मंत्र को बोलते हुए संकल्प कीजिए कि मैं अमुक व्यक्ति अमुक स्थान व समय पर अमुक देवी-देवता की पूजा करने जा रहा हूं जिससे मुझे शास्त्रोक्त फल प्राप्त हों।

सबसे पहले गणेशजी व गौरी का पूजन कीजिए। उसके बाद वरुण पूजा यानी कलश पूजन करनी चाहिए। हाथ में थोड़ा सा जल ले लीजिए और आह्वान व पूजन मंत्र बोलिए और पूजा सामग्री चढ़ाइए। फिर नवग्रहों का पूजन कीजिए। हाथ में अक्षत और पुष्प ले लीजिए और नवग्रह स्तोत्र बोलिए। इसके बाद भगवती षोडश मातृकाओं का पूजन किया जाता है।

हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प ले लीजिए। 16 माताओं को नमस्कार कर लीजिए और पूजा सामग्री चढ़ा दीजिए। 16 माताओं की पूजा के बाद रक्षाबंधन होता है। रक्षाबंधन विधि में मौली लेकर भगवान गणपति पर चढ़ाइए और फिर अपने हाथ में बंधवा लीजिए और तिलक लगा लीजिए। अब आनंदचित्त से निर्भय होकर महालक्ष्मी की पूजा प्रारंभ कीजिए।
पूजन विधि :
भूमि को गंगाजल इत्यादी से शुद्ध करके नवग्रह यंत्र बनाएं। यंत्र के साथ ही तांबे के कलश में गंगाजल, दूध, दही, शहद, सुपारी, लौंग आदि डालकर कलश को लाल कपड़े से ढककर एक जटा युक्त नारियल मौली से बांधकर रख दें। नवग्रह यंत्र के पास चांदी का सिक्का और लक्ष्मी गणेश कि प्रतिमा स्थापित कर पंचामृत से स्नान कराकर स्वच्छ लाल कपड़े से पोछ कर लक्ष्मी गणेश को चंदन, अक्षत अर्पित करके फल-फूल आदि अर्पित करें और प्रतिमा के दाहिनी ओर शुद्ध घी का एक दीपक एवं बाई और तेल (मिठेतेल) का एक दीपक जलाएं। पवित्र आसन पर बैठकर स्वस्ति वाचन करें।
गणेश जी का स्मरण कर अपने दाहिने हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प, दूर्वा, द्रव्य आदि लेकर गणेश, महालक्ष्मी, कुबेर आदि देवी-देवताओं के विधिवत पूजन का संकल्प करें।
सर्वप्रथम गणेश और लक्ष्मी का पूजन करें। उसके पश्चयात षोडशमातृका पूजन व नवग्रह पूजन कर अन्य देवी-देवताओं का पूजन करें।
दीपक पूजन :
दीपक जीवन से अज्ञान रुपी अंधकार को दूर कर जीवन में ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक हैं। दीपक को इश्वर का तेजस्वी रूप मान कर इसकी पूजा करनी चाहिए। पूजा करते समय अंतःकरण में पूर्ण श्रद्धा एवं शुद्ध भावना रखनी चाहिए। दीपावली के दिन पारिवारिक परंपराओं के अनुसार तिल के तेल के सात, ग्यारह, इक्कीस अथवा इनसे अधिक दीपक प्रज्वलित करके एक थाली में रखकर कर पूजन करने का विधान हैं।

उपरोक्त पूजन के पश्चयात घर कि महिलाएं अपने हाथ से सोने-चांदी के आभूषण इत्यादि सुहाग कि संपूर्ण सामग्रीयां लेकर मां लक्ष्मी को अर्पित करदें। अगले दिन स्नान इत्यादि के पश्चयात विधि-विधान से पूजन के बाद आभूषण एवं सुहाग कि सामग्री को मां लक्ष्मी का प्रसाद समजकर स्वयं प्रयोग करें। एसा करने से मां लक्ष्मी कि कृपा सदा बनी रहती है।
जीवन में सफलता एवं आर्थिक स्थिति में उन्नति के लिए सिंह लग्न अथवा स्थिर लग्न का चुनाव कर श्रीसूक्त, कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें।
दीपावली पूजन के समय गणेश एवं लक्ष्मी के साथ विष्णु जी का पूजन अवश्य करें जिस्से घरमें स्थिर लक्ष्मी का निवास हो सके। लक्ष्मी जी के दाहिनी ओर विष्णु जी और बाईं ओर गणेश जी कि स्थापना करनी चाहिए।
स्थिर लक्ष्मी कि कामना हेतु दक्षिणावर्ती शंख, मोती शंख, गोमती चक्र इत्यादि को शास्त्रों में लक्ष्मी के सहोदर भाई माना गया हैं। इन दुर्लभ वस्तुओं कि स्थापना करने से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं। मां वैभव लक्ष्मी की कृपा से दुनिया की खुशी प्राप्त हो सकती है. इसके लिए साधक को मां वैभव लक्ष्मी की पूजा, व्रत व आरती विधि-विधान पूर्वक करना चाहिए. मां वैभव लक्ष्मी की आरती इस प्रकार है-
ऊँ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता.
तुमको निशदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥ ऊँ जय लक्ष्मी माता
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता.
सूर्य चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥ ऊँ जय लक्ष्मी माता
दुर्गा रुप निरंजनि, सुख-सम्पत्ति दाता.
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्घि-सिद्घि धन पाता॥ ऊँ जय लक्ष्मी माता
तुम पाताल निवासिनी, तुम ही शुभदाता.
कर्म प्रभाव प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता॥ ऊँ जय लक्ष्मी माता
जिस घर में तुम रहती, सब सद्गुण आता.
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥ ऊँ जय लक्ष्मी माता
तुम बिन यज्ञ न होवे, वस्त्र न कोई पाता.
खान पान का वैभव, सब तुमसे आता॥ ऊँ जय लक्ष्मी माता
शुभ-गुण मंदिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता.
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥ ऊँ जय लक्ष्मी माता
श्री महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई नर गाता.
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता ॥ ऊँ जय लक्ष्मी माता

पद्मावती मंत्र से पाएं सुख-समृद्धि दीपावली पर पद्मावती मं‍त्र से पाएं सुनहरी समृद्धि
मंत्रों का जाप करने से मनुष्य को आध्या‍त्मिक शक्ति प्राप्त होती है। निष्ठा और विधिपूर्वक करने से इच्छित फल भी प्राप्त होता है। महालक्ष्मी पूजन में इस पद्मावती मंत्र का जाप करें।
ॐ नमो भगवती पद्मावती सर्वजन मोहनी,
सर्व कार्य करनी, मम विकट संकट हरणी,
मम मनोरथ पूरणी, मम चिंता चूरणी नमों।
ॐ पद्मावती नम स्वाहा:।

उपरोक्त पद्मावती मंत्र की एक माला दीपावली से लेकर प्रतिदिन प्रात: आंतरिक भाव से जपने से मनुष्य को रोजगार और धन की प्राप्ति होती है।
दीपावली पर अगर आप विधि विधान से बड़ी पूजा करने में असमर्थ हैं लेकिन महालक्ष्मी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो सिर्फ इन सरल महामंत्रों का जाप करें।
महालक्ष्मी मंत्र 1

ॐ ह्रीं श्री क्रीं क्लीं श्री लक्ष्मी मम गृहे धन पूरये, धन पूरये, चिंताएं दूरये-दूरये स्वाहा:।
दिवाली के दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छता से धूप देकर, दीप जलाकर 108 बार उपरोक्त मंत्र को एकाग्रचित्त होकर जपने से मनोवांछित कामना की पूर्ति होती है।

महालक्ष्मी मंत्र 2

ॐ ह्रीं ह्रीं श्री लक्ष्मी वासुदेवाय नम:।
इस मंत्र की 11 माला दिवाली की सुबह शुद्ध भावना से दीप जलाकर और धूप देकर जपने से धन, सुख, शांति प्राप्त होती है।

महालक्ष्मी मंत्र 3

पद्मानने पद्म पद्माक्ष्मी पद्म संभवे , तन्मे भजसि पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम्।।
उपरोक्त मंत्र की दीपावली पर धूप, नेवैद्य के साथ दीप जलाकर प्रात: व रात को एक माला जपने से लक्ष्मी सुख, समृद्धि और ऐश्वर्य का वरदान देती हैं।

महालक्ष्मी मंत्र 4

ॐ आं ह्रीं क्रौं श्री श्रिये नम: ममा लक्ष्मी नाश्य-नाश्य मामृणोत्तीर्ण कुरु-कुरु सम्पदं वर्धय-वर्धय स्वाहा:।
एकाग्रचित होकर, दीप जलाकर, धूप करके उपरोक्त मंत्र कागज पर 108 बार लिखते हुए उच्चारण करने से दीपावली के एक माह में दरिद्रता दूर होकर सर्व सुख और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

महालक्ष्मी मंत्र 5

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्री सिद्ध लक्ष्म्यै नम:
उपरोक्त मंत्र की 11 माला दिवाली और फिर प्रति दिन जपने से धन-धान्य की प्राप्ति होती है।

महालक्ष्मी मंत्र 6

ॐ ह्रीं श्री क्ली नम:
इस मंत्र की दीपावली के दिन प्रात: सात माला जपने से हर कार्य से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

महालक्ष्मी मंत्र 7

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नम:।
उपरोक्त मंत्र की 11 माला जपने से कर्ज से मुक्ति मिलती है।

महालक्ष्मी मंत्र 8

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्ह नम: महालक्ष्म्यै धरणेंद्र पद्मावती सहिते हूं श्री नम:।
इस मंत्र की 11 माला जपने से प्रत्यक्ष लाभ होता है। लक्ष्मी का अभाव नहीं रहता है। यह चमत्कारी मंत्र अनुभूत है।
।। लक्ष्मी चालीसा ।।

मातु लक्ष्मी करि कृपा करो हृदय में वास। मनोकामना सिद्ध कर पुरवहु मेरी आस॥
सिंधु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारंबार। ऋद्धि सिद्धि मंगलप्रदे नत शिर बारंबार॥ टेक॥
सोरठा
ही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करूं। सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥

॥ चौपाई ॥

सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि॥
तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरबहु आस हमारी॥
जै जै जगत जननि जगदम्बा। सबके तुमही हो स्वलम्बा॥
तुम ही हो घट घट के वासी। विनती यही हमारी खासी॥
जग जननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी।
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥
कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी। जगत जननि विनती सुन मोरी॥
ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥
क्षीर सिंधु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिंधु में पायो॥
चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभुहिं बनि दासी॥
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥
तब तुम प्रकट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥
अपनायो तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥
तुम सब प्रबल शक्ति नहिं आनी। कहं तक महिमा कहौं बखानी॥
मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन- इच्छित वांछित फल पाई॥
तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मन लाई॥
और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करे मन लाई॥
ताको कोई कष्ट न होई। मन इच्छित फल पावै फल सोई॥
त्राहि- त्राहि जय दुःख निवारिणी। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि॥
जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे। इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै॥
ताको कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै।
पुत्र हीन और सम्पत्ति हीना। अन्धा बधिर कोढ़ी अति दीना॥
विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥
पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥
बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥
प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं। उन सम कोई जग में नाहिं॥
बहु विधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥
करि विश्वास करैं व्रत नेमा। होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥
जय जय जय लक्ष्मी महारानी। सब में व्यापित जो गुण खानी॥
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयाल कहूं नाहीं॥
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजे॥
भूल चूक करी क्षमा हमारी। दर्शन दीजै दशा निहारी॥
बिन दरशन व्याकुल अधिकारी। तुमहिं अक्षत दुःख सहते भारी॥
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥
रूप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
कहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्धि मोहिं नहिं अधिकाई॥
रामदास अब कहाई पुकारी। करो दूर तुम विपति हमारी॥
दोहा

त्राहि त्राहि दुःख हारिणी हरो बेगि सब त्रास। जयति जयति जय लक्ष्मी करो शत्रुन का नाश॥
रामदास धरि ध्यान नित विनय करत कर जोर। मातु लक्ष्मी दास पर करहु दया की कोर॥
।। इति लक्ष्मी चालीसा संपूर्णम।।

दीपावली का अर्थ है दीपों की पंक्ति। दीपावली शब्द ‘दीप’ एवं ‘आवली’ की संधिसे बना है। आवली अर्थात पंक्ति, इस प्रकार दीपावली शब्द का अर्थ है, दीपोंकी पंक्ति । भारतवर्षमें मनाए जानेवाले सभी त्यौहारों में दीपावलीका सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात् ‘अंधेरे से ज्योति अर्थात प्रकाश की ओर जाइए’ यह उपनिषदोंकी आज्ञा है। इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं। माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा श्री रामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे। अयोध्यावासियों का ह्रदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से उल्लसित था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए । कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते हैं। यह पर्व अधिकतर ग्रिगेरियन कैलन्डर के अनुसार अक्तूबर या नवंबर महीने में पड़ता है। दीपावली दीपों का त्योहार है। इसे दीवाली या दीपावली भी कहते हैं। दीवाली अँधेरे से रोशनी में जाने का प्रतीक है। भारतीयों का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है झूठ का नाश होता है। दीवाली यही चरितार्थ करती है- असतो माऽ सद्गमय , तमसो माऽ ज्योतिर्गमय। दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है। कई सप्ताह पूर्व ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती है। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन,सफ़ेदी आदि का कार्य होने लगता हैं। लोग दुकानों को भी साफ़ सुथरा का सजाते हैं। बाज़ारों में गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है। दीपावली से पहले ही घर-मोहल्ले, बाज़ार सब साफ-सुथरे व सजे-धजे नज़र आते हैं।
धार्मिक संदर्भ
दीप जलाने की प्रथा के पीछे अलग-अलग कारण या कहानियाँ हैं। राम भक्तों के अनुसार दीवाली वाले दिन अयोध्या के राजा राम लंका के अत्याचारी राजा रावण का वध करके अयोध्या लौटे थे। उनके लौटने कि खुशी मे आज भी लोग यह पर्व मनाते है। कृष्ण भक्तिधारा के लोगों का मत है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था। इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दीए जलाए। एक पौराणिक कथा के अनुसार विंष्णु ने नरसिंह रुप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था तथा इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए। जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस भी दीपावली को ही है। सिक्खों के लिए भी दीवाली महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन ही अमृतसर में १५७७ में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था। और इसके अलावा १६१९ में दीवाली के दिन सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को जेल से रिहा किया गया था। नेपालियों के लिए यह त्योहार इसलिए महान है क्योंकि इस दिन से नेपाल संवत में नया वर्ष शुरू होता है।
पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ का जन्म व महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुआ। इन्होंने दीपावली के दिन गंगातट पर स्नान करते समय 'ओम' कहते हुए समाधि ले ली। महर्षि दयानन्द ने भारतीय संस्कृति के महान जननायक बनकर दीपावली के दिन अजमेर के निकट अवसान लिया। इन्होंने आर्य समाज की स्थापना की। दीन-ए-इलाही के प्रवर्तक मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में दौलतखाने के सामने ४० गज ऊँचे बाँस पर एक बड़ा आकाशदीप दीपावली के दिन लटकाया जाता था। बादशाह जहाँगीर भी दीपावली धूमधाम से मनाते थे। मुगल वंश के अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर दीपावली को त्योहार के रूप में मनाते थे और इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में वे भाग लेते थे। शाह आलम द्वितीय के समय में समूचे शाही महल को दीपों से सजाया जाता था एवं लालकिले में आयोजित कार्यक्रमों में हिन्दू-मुसलमान दोनों भाग लेते थे।
पर्वों का समूह दीपावली
रंगोली
दीपावली के दिन भारत में विभिन्न स्थानों पर मेले लगते हैं। दीपावली एक दिन का पर्व नहीं अपितु पर्वों का समूह है। दशहरे के पश्चात ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती है। लोग नए-नए वस्त्र सिलवाते हैं। दीपावली से दो दिन पूर्व धनतेरस का त्योहार आता है। इस दिन बाज़ारों में चारों तरफ़ जनसमूह उमड़ पड़ता है। बरतनों की दुकानों पर विशेष साज-सज्जा व भीड़ दिखाई देती है। धनतेरस के दिन बरतन खरीदना शुभ माना जाता है अतैव प्रत्येक परिवार अपनी-अपनी आवश्यकता अनुसार कुछ न कुछ खरीदारी करता है। इस दिन तुलसी या घर के द्वार पर एक दीपक जलाया जाता है। इससे अगले दिन नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली होती है। इस दिन यम पूजा हेतु दीपक जलाए जाते हैं। अगले दिन दीपावली आती है। इस दिन घरों में सुबह से ही तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं। बाज़ारों में खील-बताशे , मिठाइयाँ ,खांड़ के खिलौने, लक्ष्मी-गणेश आदि की मूर्तियाँ बिकने लगती हैं । स्थान-स्थान पर आतिशबाजी और पटाखों की दूकानें सजी होती हैं। सुबह से ही लोग रिश्तेदारों, मित्रों, सगे-संबंधियों के घर मिठाइयाँ व उपहार बाँटने लगते हैं। दीपावली की शाम लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा की जाती है। पूजा के बाद लोग अपने-अपने घरों के बाहर दीपक व मोमबत्तियाँ जलाकर रखते हैं। चारों ओर चमकते दीपक अत्यंत सुंदर दिखाई देते हैं। रंग-बिरंगे बिजली के बल्बों से बाज़ार व गलियाँ जगमगा उठते हैं। बच्चे तरह-तरह के पटाखों व आतिशबाज़ियों का आनंद लेते हैं। रंग-बिरंगी फुलझड़ियाँ, आतिशबाज़ियाँ व अनारों के जलने का आनंद प्रत्येक आयु के लोग लेते हैं। देर रात तक कार्तिक की अँधेरी रात पूर्णिमा से भी से भी अधिक प्रकाशयुक्त दिखाई पड़ती है। दीपावली से अगले दिन गोवर्धन पर्वत अपनी अँगुली पर उठाकर इंद्र के कोप से डूबते ब्रजवासियों को बनाया था। इसी दिन लोग अपने गाय-बैलों को सजाते हैं तथा गोबर का पर्वत बनाकर पूजा करते हैं। अगले दिन भाई दूज का पर्व होता है। दीपावली के दूसरे दिन व्यापारी अपने पुराने बहीखाते बदल देते हैं। वे दूकानों पर लक्ष्मी पूजन करते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से धन की देवी लक्ष्मी की उन पर विशेष अनुकंपा रहेगी। कृषक वर्ग के लिये इस पर्व का विशेष महत्त्व है। खरीफ़ की फसल पक कर तैयार हो जाने से कृषकों के खलिहान समृद्ध हो जाते हैं। कृषक समाज अपनी समृद्धि का यह पर्व उल्लासपूर्वक मनाता हैं।
परंपरा
अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाई-चारे व प्रेम का संदेश फैलाता है। यह पर्व सामूहिक व व्यक्तिगत दोनों तरह से मनाए जाने वाला ऐसा विशिष्ट पर्व है जो धार्मिक, सांस्कृतिक व सामाजिक विशिष्टता रखता है। हर प्रांत या क्षेत्र में दीवाली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला आ रहा है। लोगों में दीवाली की बहुत उमंग होती है। लोग अपने घरों का कोना-कोना साफ़ करते हैं, नये कपड़े पहनते हैं। मिठाइयों के उपहार एक दूसरे को बाँटते हैं, एक दूसरे से मिलते हैं। घर-घर में सुन्दर रंगोली बनायी जाती है, दिये जलाए जाते हैं और आतिशबाजी की जाती है। बड़े छोटे सभी इस त्योहार में भाग लेते हैं। अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाई-चारे व प्रेम का संदेश फैलाता है। हर प्रांत या क्षेत्र में दीवाली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला आ रहा है। लोगों में दीवाली की बहुत उमंग होती है।


अपनी राशि के अनुसार नियमित रूप से इन मंत्रों का जाप करें और सुख, समृद्धि, सेहत, वैभव, पराक्रम तथा सफलता के सुनहरे परचम लहराएं।
मेष : ऊँ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीनारायण नम:।
वृषभ : ऊँ गौपालायै उत्तर ध्वजाय नम:।
मिथुन : ऊँ क्लीं कृष्णायै नम:।
कर्क : ऊँ हिरण्यगर्भायै अव्यक्त रूपिणे नम:।
सिंह : ऊँ क्लीं ब्रह्मणे जगदाधारायै नम:।
कन्या : ऊँ नमो प्रीं पीताम्बरायै नम:।
तुला : ऊँ तत्व निरंजनाय तारक रामायै नम:।
वृश्चिक : ऊँ नारायणाय सुरसिंहायै नम:।
धनु : ऊँ श्रीं देवकीकृष्णाय ऊर्ध्वषंतायै नम:।
मकर : ऊँ श्रीं वत्सलायै नम:।
कुंभ : श्रीं उपेन्द्रायै अच्युताय नम:।
मीन : ऊँ क्लीं उद्‍धृताय उद्धारिणे नम:।

कोई भी व्यक्ति अपनी राशि के अनुसार उपरोक्त मंत्रों का जाप करें तो शीघ्र सफलता मिलती है। मंत्र पाठ से व्यक्ति हर प्रकार के संकट से मुक्त रहता है। आर्थिक रूप से संपन्न हो जाता है। साथ ही जो आपके मार्ग में रोड़ा अटकाते हैं, वे भी इस जाप के समक्ष नतमस्तक हो जाते हैं।  
                      ऊँ श्री लक्ष्मीनारायण नम:

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