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हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥ हे नाथ मैँ आपको भूलूँ नही...!! हे नाथ ! आप मेरे हृदय मेँ ऐसी आग लगा देँ कि आपकी प्रीति के बिना मै जी न सकूँ.

Tuesday, July 10, 2012

सावन माह की विशेषता









सावन माह की विशेषता

भारत के सभी शिवालयों में श्रावण सोमवार पर हर-हर महादेव और बोल बम बोल की गूँज सुनाई देगी। श्रावण मास में शिव-पार्वत‍ी का पूजन बहुत फलदायी होता है। इसलिए सावन मास का बहुत मह‍त्व है।

क्यों है सावन की विशेषता? :- हिन्दू धर्म की पौराणिक मान्यता के अनुसार सावन महीने को देवों के देव महादेव भगवान शंकर का महीना माना जाता है। इस संबंध में पौराणिक कथा है कि जब सनत कुमारों ने महादेव से उन्हें सावन महीना प्रिय होने का कारण पूछा तो महादेव भगवान शिव ने बताया कि जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया था।

अपने दूसरे जन्म में देवी सती ने पार्वती के नाम से हिमाचल और रानी मैना के घर में पुत्री के रूप में जन्म लिया। पार्वती ने युवावस्था के सावन महीने में निराहार रह कर कठोर व्रत किया और उन्हें प्रसन्न कर विवाह किया, जिसके बाद ही महादेव के लिए यह विशेष हो गया।

सावन में शिवशंकर की पूजा :- सावन के महीने में भगवान शंकर की विशेष रूप से पूजा की जाती है। इस दौरान पूजन की शुरूआत महादेव के अभिषेक के साथ की जाती है। अभिषेक में महादेव को जल, दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, गंगाजल, गन्ना रस आदि से स्नान कराया जाता है। अभिषेक के बाद बेलपत्र, समीपत्र, दूब, कुशा, कमल, नीलकमल, ऑक मदार, जंवाफूल कनेर, राई फूल आदि से शिवजी को प्रसन्न किया जाता है। इसके साथ की भोग के रूप में धतूरा, भाँग और श्रीफल महादेव को चढ़ाया जाता है।

महादेव का अभिषेक :- महादेव का अभिषेक करने के पीछे एक पौराणिक कथा का उल्लेख है कि समुद्र मंथन के समय हलाहल विष निकलने के बाद जब महादेव इस विष का पान करते हैं तो वह मूर्च्छित हो जाते हैं। उनकी दशा देखकर सभी देवी-देवता भयभीत हो जाते हैं और उन्हें होश में लाने के लिए निकट में जो चीजें उपलब्ध होती हैं, उनसे महादेव को स्नान कराने लगते हैं। इसके बाद से ही जल से लेकर तमाम उन चीजों से महादेव का अभिषेक किया जाता है।

बेलपत्र और समीपत्र :- भगवान शिव को भक्त प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र और समीपत्र चढ़ाते हैं। इस संबंध में एक पौराणिक कथा के अनुसार जब 89 हजार ऋषियों ने महादेव को प्रसन्न करने की विधि परम पिता ब्रह्मा से पूछी तो ब्रह्मदेव ने बताया कि महादेव सौ कमल चढ़ाने से जितने प्रसन्न होते हैं, उतना ही एक नीलकमल चढ़ाने पर होते हैं। ऐसे ही एक हजार नीलकमल के बराबर एक बेलपत्र और एक हजार बेलपत्र चढ़ाने के फल के बराबर एक समीपत्र का महत्व होता है।

बेलपत्र ने दिलाया वरदान : बेलपत्र महादेव को प्रसन्न करने का सुलभ माध्यम है। बेलपत्र के महत्व में एक पौराणिक कथा के अनुसार एक भील डाकू परिवार का पालन-पोषण करने के लिए लोगों को लूटा करता था। सावन महीने में एक दिन डाकू जंगल में राहगीरों को लूटने के इरादे से गया। एक पूरा दिन-रात बीत जाने के बाद भी कोई शिकार नहीं मिलने से डाकू काफी परेशान हो गया।

इस दौरान डाकू जिस पेड़ पर छुपकर बैठा था, वह बेल का पेड़ था और परेशान डाकू पेड़ से पत्तों को तोड़कर नीचे फेंक रहा था। डाकू के सामने अचानक महादेव प्रकट हुए और वरदान माँगने को कहा। अचानक हुई शिव कृपा जानने पर डाकू को पता चला कि जहाँ वह बेलपत्र फेंक रहा था उसके नीचे शिवलिंग स्थापित है। इसके बाद से बेलपत्र का महत्व और बढ़ गया।

विशेष सजावट : सावन मास में शिव मंदिरों में विशेष सजावट की जाती है। शिवभक्त अनेक धार्मिक नियमों का पालन करते हैं। साथ ही महादेव को प्रसन्न करने के लिए किसी ने नंगे पाँव चलने की ठानी, तो कोई पूरे सावन भर अपने केश नहीं कटाएगा। वहीं कितनों ने माँस और मदिरा का त्याग कर दिया है।

काँवरिए चले शिव के धाम : सावन का महीना शिवभक्तों के लिए खास होता है। शिवभक्त काँवरियों में जल लेकर शिवधाम की ओर निकल पड़ते हैं। शिवालयों में जल चढ़ाने के लिए लोग बोल बम के नारे लगाते घरों से निकलते हैं। भक्त भगवा वस्त्र धारण कर शिवालयों की ओर कूच करते हैं।

भगवान शिव की कृपा भक्ति

पौराणिक कथाओं एवं जनश्रुतियों में जो कहावतें सुनने को मिलती हैं। उससे यह स्पष्ट है कि धन सम्पदा एवं लक्ष्मी प्राप्ति में शिव पूजा के समान अन्य कोई उपाय नहीं है। जटाधारी भुजगपतिहारी चिताभस्मलेपी गंगाधर भगवान भोलेनाथ अपने तीसरे नेत्र की भीषण वेधनक्षमता वाली उग्र ज्वालामयी नेत्र ज्योति से ब्रह्माण्ड के पार तक के दृश्य को समग्र रूप से देख पाने में समर्थ है।

कंठ में हलाहल होने के कारण अन्दर से विकल किन्तु समस्त जगत को सुख-शान्ति प्रदान करने हेतु अति सूक्ष्म तथा विकट कारणों का भी निवारण कर देते हैं। आवश्यकता मात्र भगवान साम्बसदाशिव की शरण में जाने की है। वह भी विश्वास के साथ।

सदा छप्पन भोग एवं सोने-चाँदी से भगवान शिव की पूजा करने वाले राजा छविकृति भगवान शनि के प्रकोप से नष्ट हो गए। कारण यह था कि उन्होंने भगवान शिव की पूजा- श्रद्धा एवं विश्वास के साथ नहीं बल्कि अपनी वाहवाही, दिखावे के लिए ही किया था।

किन्तु क्रम से विधिपूर्वक हल्दी, चन्दन, बेलपत्र, धतूरा, पुष्प एवं जल चढ़ाने वाली प्रभावती के डर से शनि देव को तब तक वृष राशि में प्रवेश करने की हिम्मत नहीं पड़ी। जब तक उसकी राशि का स्वामी शुक्र मीन राशि में गुरु के साथ और चन्द्रमा उसकी राशि में प्रवेश नहीं कर गया। तब तक शनि देव को इंतजार करना पड़ गया।

राजा छविकृति ने केवल उचित क्रम से ही पदार्थों को शिव लिंग पर चढ़ाया था। 'रुद्रनिधान' में क्रम निम्न प्रकार बताया गया है। इसी क्रम में पदार्थों को शिवलिंग पर चढ़ाने का विधान है।

'नीरसचन्दनबिल्वपत्रेत्रगंधानुलेपनं। हरिद्राखण्डं पुष्पार्पणमभिषेक गोरसेन च। अगरतगरकर्पूरादिक मध्वान्नं फल पयार्पणं। तदान्ते जलार्पणं तत्रान्ते च नीराजनम्‌। अपराधाय क्षमायाचना तत्प्रसादांगीयताम्‌। हर हर शिव ननादयित्वा हर कृपा खलु लब्धयेत्‌।'

किन्तु देखने में आया है कि प्रायः लोग पदार्थों को चढ़ाने का क्रम नहीं जानते हैं। तथा कुछ लोग हल्दी के बाद चन्दन तथा कुछ दही चढ़ाकर सिन्दूर चढ़ाने लगते हैं। वैसे तो भगवान शिव की चाहे जैसे पूजा करें, उन्हें शिवजी की कृपा प्राप्त होती है। किन्तु क्या सब्जी खाकर, दाल पीकर, तब चावल में रोटी मसल कर खा सकते हैं? या चावल खाकर, हाथ मुँह धोकर फिर सब्जी और चटनी खायी जाती है? कितना रुचिकर खाना होगा? या फिर कितना सुन्दर उसका पाचन शरीर में होगा?

उसी प्रकार पूजा के पदार्थों को चढ़ाने का एक निश्चित क्रम बताया गया है। उस क्रम से न चढाने पर प्रेम एवं विश्वास का फल भले भगवान शिव दे दें। किन्तु पूजा का कोई फल प्राप्त नहीं होता है। भगवान शिव सभी का कल्याण करें।

भगवान शिव-महाकाल का महात्म्य

पुराणों में, वेदों में और शास्त्रों में भगवान शिव-महाकाल के महात्म्य को प्रतिपादित किया गया है। भगवान शिव हिन्दू संस्कृति के प्रणेता आदिदेव महादेव हैं। हमारी सांस्कृतिक मान्यता के अनुसार 33 करोड़ देवताओं में 'शिरोमणि' देव शिव ही हैं। सृष्टि के तीनों लोकों में भगवान शिव एक अलग, अलौकिक शक्ति वाले देव हैं।

भगवान शिव पृथ्वी पर अपने निराकार-साकार रूप में निवास कर रहे हैं। भगवान शिव सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान हैं। महाशिवरात्रि पर्व भगवान शिवशंकर के प्रदोष तांडव नृत्य का महापर्व है। शिव प्रलय के पालनहार हैं और प्रलय के गर्भ में ही प्राणी का अंतिम कल्याण सन्निहित है। शिव शब्द का अर्थ है 'कल्याण' और 'रा' दानार्थक धातु से रात्रि शब्द बना है, तात्पर्य यह कि जो सुख प्रदान करती है, वह रात्रि है।

'शिवस्य प्रिया रात्रियस्मिन व्रते अंगत्वेन विहिता तदव्रतं शिवरात्र्‌याख्याम्‌।'

इस प्रकार शिवरात्रि का अर्थ होता है, वह रात्रि जो आनंद प्रदायिनी है और जिसका शिव के साथ विशेष संबंध है। शिवरात्रि, जो फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को है, उसमें शिव पूजा, उपवास और रात्रि जागरण का प्रावधान है। इस महारात्रि को शिव की पूजा करना सचमुच एक महाव्रत है।

ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति महाशिवरात्रि के व्रत पर भगवान शिव की भक्ति, दर्शन, पूजा, उपवास एवं व्रत नहीं रखता, वह सांसारिक माया, मोह एवं आवागमन के बँधन से हजारों वर्षों तक उलझा रहता है। यह भी कहा गया है कि जो शिवरात्रि पर जागरण करता है, उपवास रखता है और कहीं भी किसी भी शिवजी के मंदिर में जाकर भगवान शिवलिंग के दर्शन करता है, वह जन्म-मरण पुनर्जन्म के बँधन से मुक्ति पा जाता है। शिवरात्रि के व्रत के बारे में पुराणों में कहा गया है कि इसका फल कभी किसी हालत में भी निरर्थक नहीं जाता है।

शिवरात्रि व्रत धर्म का उत्तम साधन : शिवरात्रि का व्रत सबसे अधिक बलवान है। भोग और मोक्ष का फलदाता शिवरात्रि का व्रत है। इस व्रत को छोड़कर दूसरा मनुष्यों के लिए हितकारक व्रत नहीं है। यह व्रत सबके लिए धर्म का उत्तम साधन है। निष्काम अथवा सकाम भाव रखने वाले सांसारिक सभी मनुष्य, वर्णों, आश्रमों, स्त्रियों, पुरुषों, बालक-बालिकाओं तथा देवता आदि सभी देहधारियों के लिए शिवरात्रि का यह श्रेष्ठ व्रत हितकारक है।

शिवरात्रि के दिन प्रातः उठकर स्नानादि कर शिव मंदिर जाकर शिवलिंग का विधिवत पूजन कर नमन करें। रात्रि जागरण महाशिवरात्रि व्रत में विशेष फलदायी है।

गीता में इसे स्पष्ट किया गया है-

या निशा सर्वभूतानां तस्या जागर्ति संयमी।
यस्यां जागृति भूतानि सा निशा पश्चतो सुनेः॥

तात्पर्य यह कि विषयासक्त सांसारिक लोगों की जो रात्रि है, उसमें संयमी लोग ही जागृत अवस्था में रहते हैं और जहाँ शिवपूजा का अर्थ पुष्प, चंदन एवं बिल्वपत्र, धतूरा, भाँग आदि अर्पित कर भगवान शिव का जप व ध्यान करना और चित्त वृत्ति का निरोध कर जीवात्मा का परमात्मा शिव के साथ एकाकार होना ही वास्तविक पूजा है। शिवरात्रि में चार प्रहरों में चार बार अलग-अलग विधि से पूजा का प्रावधान है।

महाशिवरात्रि के प्रथम प्रहर में भगवान शिव की ईशान मूर्ति को दुग्ध द्वारा स्नान कराएँ, दूसरे प्रहर में उनकी अघोर मूर्ति को दही से स्नान करवाएँ और तीसरे प्रहर में घी से स्नान कराएँ व चौथे प्रहर में उनकी सद्योजात मूर्ति को मधु द्वारा स्नान करवाएँ। इससे भगवान आशुतोष अतिप्रसन्न होते हैं। प्रातःकाल विसर्जन और व्रत की महिमा का श्रवण कर अमावस्या को निम्न प्रार्थना कर पारण करें -

संसार क्लेश दग्धस्य व्रतेनानेन शंकर।
प्रसीद समुखोनाथ, ज्ञान दृष्टि प्रदोभव॥

तात्पर्य यह कि भगवान शंकर! मैं हर रोज संसार की यातना से, दुःखों से दग्ध हो रहा हूँ। इस व्रत से आप मुझ पर प्रसन्न हों और प्रभु संतुष्ट होकर मुझे ज्ञानदृष्टि प्रदान करें।

'ॐ नमः शिवाय' कहिए और देवादिदेव प्रसन्न होकर सब मनोरथ पूर्ण करेंगे। शिवरात्रि के दिन शिव को ताम्रफल (बादाम), कमल पुष्प, अफीम बीज और धतूरे का पुष्प चढ़ाना चाहिए एवं अभिषेक कर बिल्व पत्र चढ़ाना चाहिए।


महाकालेश्वर की पौराणिक गाथा

'अनेकानेक प्राचीन वांग्मय महाकाल की व्यापक महिमा से आपूरित हैं क्योंकि वे कालखंड, काल सीमा, काल-विभाजन आदि के प्रथम उपदेशक व अधिष्ठाता हैं।

अवन्तिकायां विहितावतारं
मुक्ति प्रदानाय च सज्जनानाम्‌
अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं
वन्दे महाकाल महासुरेशम॥

'अर्थात जिन्होंने अवन्तिका नगरी (उज्जैन) में संतजनों को मोक्ष प्रदान करने के लिए अवतार धारण किया है, अकाल मृत्यु से बचने हेतु मैं उन 'महाकाल' नाम से सुप्रतिष्ठित भगवान आशुतोष शंकर की आराधना, अर्चना, उपासना, वंदना करता हूँ।

इस दिव्य पवित्र मंत्र से निःसृत अर्थध्वनि भगवान शिव के सहस्र रूपों में सर्वाधिक तेजस्वी, जागृत एवं ज्योतिर्मय स्वरूप सुपूजित श्री महाकालेश्वर की असीम, अपार महत्ता को दर्शाती है।

शिव पुराण की 'कोटि-रुद्र संहिता' के सोलहवें अध्याय में तृतीय ज्योतिर्लिंग भगवान महाकाल के संबंध में सूतजी द्वारा जिस कथा को वर्णित किया गया है, उसके अनुसार अवंती नगरी में एक वेद कर्मरत ब्राह्मण हुआ करता था। वह ब्राह्मण पार्थिव शिवलिंग निर्मित कर उनका प्रतिदिन पूजन किया करता था। उन दिनों रत्नमाल पर्वत पर दूषण नामक राक्षस ने ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त कर समस्त तीर्थस्थलों पर धार्मिक कर्मों को बाधित करना आरंभ कर दिया।

वह अवंती नगरी में भी आया और सभी ब्राह्मणों को धर्म-कर्म छोड़ देने के लिए कहा किन्तु किसी ने उसकी आज्ञा नहीं मानी। फलस्वरूप उसने अपनी दुष्ट सेना सहित पावन ब्रह्मतेजोमयी अवंतिका में उत्पात मचाना प्रारंभ कर दिया। जन-साधारण त्राहि-त्राहि करने लगे और उन्होंने अपने आराध्य भगवान शंकर की शरण में जाकर प्रार्थना, स्तुति शुरू कर दी। तब जहाँ वह सात्विक ब्राह्मण पार्थिव शिव की अर्चना किया करता था, उस स्थान पर एक विशाल गड्ढा हो गया और भगवान शिव अपने विराट स्वरूप में उसमें से प्रकट हुए।

विकट रूप धारी भगवान शंकर ने भक्तजनों को आश्वस्त किया और गगनभेदी हुंकार भरी, 'मैं दुष्टों का संहारक महाकाल हूँ...' और ऐसा कहकर उन्होंने दूषण व उसकी हिंसक सेना को भस्म कर दिया। तत्पश्चात उन्होंने अपने श्रद्धालुओं से वरदान माँगने को कहा। अवंतिकावासियों ने प्रार्थना की-

'महाकाल, महादेव! दुष्ट दंड कर प्रभो
मुक्ति प्रयच्छ नः शम्भो संसाराम्बुधितः शिव॥
अत्रैव्‌ लोक रक्षार्थं स्थातव्यं हि त्वया शिव
स्वदर्श कान्‌ नरांछम्भो तारय त्वं सदा प्रभो॥

अर्थात हे महाकाल, महादेव, दुष्टों को दंडित करने वाले प्रभु! आप हमें संसार रूपी सागर से मुक्ति प्रदान कीजिए, जनकल्याण एवं जनरक्षा हेतु इसी स्थान पर निवास कीजिए एवं अपने (इस स्वयं स्थापित स्वरूप के) दर्शन करने वाले मनुष्यों को अक्षय पुण्य प्रदान कर उनका उद्धार कीजिए।

इस प्रार्थना से अभिभूत होकर भगवान महाकाल स्थिर रूप से वहीं विराजित हो गए और समूची अवंतिका नगरी शिवमय हो गई।

शिवभक्त राजा चंद्रसेन और बालक

उज्जयिनी में राजा चंद्रसेन का राज था। वह भगवान शिव का परम भक्त था। शिवगणों में मुख्य मणिभद्र नामक गण उसका मित्र था। एक बार मणिभद्र ने राजा चंद्रसेन को एक अत्यंत तेजोमय 'चिंतामणि' प्रदान की। चंद्रसेन ने इसे गले में धारण किया तो उसका प्रभामंडल तो जगमगा ही उठा, साथ ही दूरस्थ देशों में उसकी यश-कीर्ति बढ़ने लगी। उस 'मणि' को प्राप्त करने के लिए दूसरे राजाओं ने प्रयास आरंभ कर दिए। कुछ ने प्रत्यक्षतः माँग की, कुछ ने विनती की।

चूँकि वह राजा की अत्यंत प्रिय वस्तु थी, अतः राजा ने वह मणि किसी को नहीं दी। अंततः उन पर मणि आकांक्षी राजाओं ने आक्रमण कर दिया। शिवभक्त चंद्रसेन भगवान महाकाल की शरण में जाकर ध्यानमग्न हो गया। जब चंद्रसेन समाधिस्थ था तब वहाँ कोई गोपी अपने छोटे बालक को साथ लेकर दर्शन हेतु आई।

बालक की उम्र थी पाँच वर्ष और गोपी विधवा थी। राजा चंद्रसेन को ध्यानमग्न देखकर बालक भी शिव की पूजा हेतु प्रेरित हुआ। वह कहीं से एक पाषाण ले आया और अपने घर के एकांत स्थल में बैठकर भक्तिभाव से शिवलिंग की पूजा करने लगा। कुछ देर पश्चात उसकी माता ने भोजन के लिए उसे बुलाया किन्तु वह नहीं आया। फिर बुलाया, वह फिर नहीं आया। माता स्वयं बुलाने आई तो उसने देखा बालक ध्यानमग्न बैठा है और उसकी आवाज सुन नहीं रहा है।

तब क्रुद्ध हो माता ने उस बालक को पीटना शुरू कर दिया और समस्त पूजन-सामग्री उठाकर फेंक दी। ध्यान से मुक्त होकर बालक चेतना में आया तो उसे अपनी पूजा को नष्ट देखकर बहुत दुःख हुआ। अचानक उसकी व्यथा की गहराई से चमत्कार हुआ। भगवान शिव की कृपा से वहाँ एक सुंदर मंदिर निर्मित हो गया। मंदिर के मध्य में दिव्य शिवलिंग विराजमान था एवं बालक द्वारा सज्जित पूजा यथावत थी। उसकी माता की तंद्रा भंग हुई तो वह भी आश्चर्यचकित हो गई।

राजा चंद्रसेन को जब शिवजी की अनन्य कृपा से घटित इस घटना की जानकारी मिली तो वह भी उस शिवभक्त बालक से मिलने पहुँचा। अन्य राजा जो मणि हेतु युद्ध पर उतारू थे, वे भी पहुँचे। सभी ने राजा चंद्रसेन से अपने अपराध की क्षमा माँगी और सब मिलकर भगवान महाकाल का पूजन-अर्चन करने लगे। तभी वहाँ रामभक्त श्री हनुमानजी अवतरित हुए और उन्होंने गोप-बालक को गोद में बैठाकर सभी राजाओं और उपस्थित जनसमुदाय को संबोधित किया।

ऋते शिवं नान्यतमा गतिरस्ति शरीरिणाम्‌॥
एवं गोप सुतो दिष्टया शिवपूजां विलोक्य च॥
अमन्त्रेणापि सम्पूज्य शिवं शिवम्‌ वाप्तवान्‌।
एष भक्तवरः शम्भोर्गोपानां कीर्तिवर्द्धनः
इह भुक्तवा खिलान्‌ भोगानन्ते मोक्षमवाप्स्यति॥
अस्य वंशेऽष्टमभावी नंदो नाम महायशाः।
प्राप्स्यते तस्यस पुत्रत्वं कृष्णो नारायणः स्वयम्‌॥

अर्थात 'शिव के अतिरिक्त प्राणियों की कोई गति नहीं है। इस गोप बालक ने अन्यत्र शिव पूजा को मात्र देखकर ही, बिना किसी मंत्र अथवा विधि-विधान के शिव आराधना कर शिवत्व-सर्वविध, मंगल को प्राप्त किया है। यह शिव का परम श्रेष्ठ भक्त समस्त गोपजनों की कीर्ति बढ़ाने वाला है। इस लोक में यह अखिल अनंत सुखों को प्राप्त करेगा व मृत्योपरांत मोक्ष को प्राप्त होगा। इसी के वंश का आठवाँ पुरुष महायशस्वी 'नंद' होगा जिसके पुत्र के रूप में स्वयं नारायण 'कृष्ण' नाम से प्रतिष्ठित होंगे। कहा जाता है भगवान महाकाल तब ही से उज्जयिनी में स्वयं विराजमान है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में महाकाल की असीम महिमा का वर्णन मिलता है। महाकाल साक्षात राजाधिराज देवता माने गए हैं।

महाशिवरात्रि के दिन समूचा शहर शिवमय हो जाता है। चारों ओर बस शिव जी का ही गुंजन सुनाई देता है। सारा शहर बाराती बन शिवविवाह में शामिल होता है। अगले दिन अमावस्या को सेहरे के अत्यंत आकर्षक दर्शन होते हैं। नयनाभिराम साजसज्जा के बीच एक उत्सव धूमधाम से संपन्न होता है। भगवान शिव की यह नगरी भक्ति रस में आकंठ डूबी नजर आती है।


जय-जय श्री महादेव शम्भो मृत्युंजय महाकाल

अनेकानेक प्राचीन वांग्मय महाकाल की व्यापक महिमा से आपूरित हैं क्योंकि वे कालखंड, काल सीमा, काल-विभाजन आदि के प्रथम उपदेशक व अधिष्ठाता हैं। स्कन्दपुराण के अवंती खंड में, शिव पुराण (ज्ञान संहिता अध्याय 38), वराह पुराण, रुद्रयामल तंत्र, शिव महापुराण की विद्येश्वर संहिता के तेइसवें अध्याय तथा रुद्रसंहिता के चौदहवें अध्याय में भगवान महाकाल की अर्चना, महिमा व विधान आदि का विस्तृत वर्णन किया गया है।

मृत्युंजय महाकाल की आराधना का मृत्यु शैया पर पड़े व्यक्ति को बचाने में विशेष महत्व है। खासकर तब जब व्यक्ति अकाल मृत्यु का शिकार होने वाला हो। इस हेतु एक विशेष जाप से भगवान महाकाल का लक्षार्चन अभिषेक किया जाता है-

'ॐ ह्रीं जूं सः भूर्भुवः स्वः,
ॐ त्र्यम्बकं स्यजा महे
सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनम्‌।
उर्व्वारूकमिव बंधनान्नमृत्योर्म्मुक्षीयमामृतात्‌
ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ'

इसी तरह सर्वव्याधि निवारण हेतु इस मंत्र का जाप किया जाता है।

शिवरात्रि में शिवोत्सव समूचे उज्जैन में मनाया जाता है। इन दिनों भक्तवत्सल्य भगवान आशुतोष महाकालेश्वर का विशेष श्रृंगार किया जाता है, उन्हें विविध प्रकार के फूलों से सजाया जाता है। यहाँ तक कि भक्तजन अपनी श्रद्धा का अर्पण इतने विविध रूपों में करते है कि देखकर आश्चर्य होता है।

कोई बिल्वपत्र की लंबी घनी माला चढ़ाता है। कोई बेर,संतरा, केले, और दूसरे फलों की माला लेकर आता है। कोई आँकड़ों के पत्तों पर चंदन से ॐ बना कर अर्पित करता है।

औढरदानी, प्रलयंकारी, दिगम्बर भगवान शिव का यह सुहाना सुसज्जित सुंदर स्वरूप देखने के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। इसे 'सेहरा' के दर्शन कहा जाता है। अंत में श्री महाकालेश्वर से परम पुनीत प्रार्थना है कि इस शिवरात्रि में इस अखिल सृष्टि पर वे प्रसन्न होकर प्राणी मात्र का कल्याण करें -

'कर-चरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा
श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम,
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व,
जय-जय करुणाब्धे, श्री महादेव शम्भो॥'

अर्थात हाथों से, पैरों से, वाणी से, शरीर से, कर्म से, कर्णों से, नेत्रों से अथवा मन से भी हमने जो अपराध किए हों, वे विहित हों अथवा अविहित, उन सबको है करुणासागर महादेव शम्भो! क्षमा कीजिए, एवं आपकी जय हो, जय हो।

Monday, July 2, 2012

गुरु पूर्णिमा गुरु भक्ति



गुरु पूर्णिमा
श्रीराम की गुरु भक्ति  

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अपने शिक्षागुरु विश्वामित्र के पास बहुत संयम, विनय और विवेक से रहते थे। गुरु की सेवा में सदैव तत्पर रहते थे। उनकी सेवा के विषय में भक्त कवि तुलसीदास ने लिखा है-

मुनिवर सयन कीन्हीं तब जाई।
लागे चरन चापन दोऊ भाई॥
जिनके चरन सरोरुह लागी।
करत विविध जप जोग विरागी॥
बार बार मुनि आज्ञा दीन्हीं।
रघुवर जाय सयन तब कीन्हीं॥
गुरु ते पहले जगपति जागे राम सुजान।

सीता-स्वयंवर में जब सब राजा धनुष उठाने का एक-एक करके प्रयत्न कर रहे थे तब श्रीराम संयम से बैठे ही रहे। जब गुरु विश्वामित्र की आज्ञा हुई तभी वे खड़े हुए और उन्हें प्रणाम करके धनुष उठाया।

सुनि गुरु बचन चरन सिर नावा। हर्ष विषादु न कछु उर आवा।
गुरुहिं प्रनाम मन हि मन किन्हा। अति लाघव उठाइ धनु लिन्हा॥

श्री सद्गुरुदेव के आदर और सत्कार में श्रीराम कितने विवेकी और सचेत थे, इसका उदाहरण जब उनको राज्योचित शिक्षण देने के लिए उनके गुरु वशिष्ठजी महाराज महल में आते हैं तब देखने को मिलता है। सद्गुरु के आगमन का समाचार मिलते ही सीताजी सहित श्रीराम दरवाजे पर आकर सम्मान करते हैं-

गुरु आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार जाय पद नावउ माथा॥
सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भांति पूजि सनमाने॥
गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले राम कमल कर जोरी॥

इसके उपरांत भक्तिभावपूर्वक कहते हैं- 'नाथ! आप भले पधारे। आपके आगमन से घर पवित्र हुआ। परन्तु होना तो यह चाहिए था कि आप समाचार भेज देते तो यह दास स्वयं सेवा में उपस्थित हो जाता।' इस प्रकार ऐसी विनम्र भक्ति से श्रीराम अपने गुरुदेव को संतुष्ट रखते हैं।

गुरु भक्ति योग

जिस प्रकार शीघ्र ईश्वर दर्शन के लिए कलयुग में भजन-कीर्तन-साधना-प्रवचन है, उसी प्रकार इस वर्तमान काल में नास्तिकता, अंहकार के युग में गुरु एवं गुरु की भक्ति तथा कृपा से ही आपके जीवन काल में अमोघ प्रभाव देता है.

अध्यात्म-मार्ग में हर एक साधक को गुरु कि आवश्यकता पड़ती है. केवल गुरु ही वास्तविक जीवन का अर्थ एवं उसका रहस्य प्रकट कर सकते हैं तथा ईश्वर का साक्षात्कार का मार्ग दिखा सकते हैं. केवल गुरु ही शिष्य को साधना का रहस्य बता सकते हैं. ऐसे गुरु मन, वचन और कर्म से पवित्र हैं. ऐसे गुरु अपने मन एवं इन्द्रियों पर प्रभुत्व रखते हैं, वे सब शास्त्रों का रहस्य समझते हैं. शिष्य ने अगर पूर्वजन्म में शुभ कर्म किये होंगे, वर्तमान जीवन में अगर वह शुभ कर्म करता होगा, अगर सच्चा, निष्टावान ह्रदयवाला तथा ईश्वर प्राप्ति कि तड़पवाला होगा तो उसे सदगुरू अवश्य प्राप्त होंगे.


गुरु भक्ति योग के अंश
*. गुरु भक्ति योग माना सदगुरु को सम्पूर्ण आत्मसमर्पण करना.
*. गुरु भक्ति योग के अभ्यास के लिए सच्चे ह्रदय की स्थिर महेच्छा. सदगुरु के विचार, वाणी और कार्यों में सम्पूर्ण श्रद्धा. गुरु के नाम का उच्चारण और गुरु को नम्रतापूर्वक साष्टांग प्रणाम. सम्पूर्ण आज्ञाकारिता के साथ गुरु के आदेशों का पालन. बिना फलप्राप्ति की अपेक्षा गुरु की सेवा. भक्तिपूर्वक हर रोज सदगुरु के चरणकमलों की पूजा. सदगुरु के दैवी कार्य के लिए आत्म समर्पण...तन, मन, धन समर्पण. गुरु की कल्याणकारी कृपा प्राप्त करने के लिए एवं उनका पवित्र उपदेश सुनकर उसका आचरण करने के लिए सदगुरु के पवित्र चरणों का ध्यान.
*. गुरु भक्ति योग का एक स्वतंत्र प्रकार है.
*. मुमुक्षु जब तक गुरु भक्ति योग का अभ्यास नहीं करता तब तक ईश्वर के साथ एकरूप होने के लिए आध्यात्मिक मार्ग में प्रवेश करना उसके लिए संभव नहीं है.
*. जो व्यक्ति गुरु भक्ति योग की महत्ता समझता है वही गुरु को बिनशरती आत्म-समर्पण का सकता है.
*. जीवन के परम ध्येय अर्थात आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति गुरु भक्ति योग के अभ्यास द्बारा ही हो सकती है.
*. गुरु भक्ति योग सच्चा एवं सुरक्षित योग है, जिसका अभ्यास करने में किसी भी प्रकार का भय नहीं है.
*. आज्ञाकारी बनकर गुरु के आदेशों का पालन करना, उनके उपदेशों को जीवन में उतारना, यही गुरु भक्ति योग का सार है.
*. जो व्यक्ति गुरु भक्ति योग का अभ्यास करता है वह बिना किसी विपत्ति से अहंभाव को निर्मूल कर सकता है, संसार में मलिन जल को बहुत सरलता से पार कर जाता है और अमरत्व एवं शाश्वत सुख प्राप्त करता है.
*. गुरु भक्ति योग मन को शांत और निश्चल बनानेवाला है.

गुरु भक्ति योग के सिद्धांत
नम्रतापूर्वक अपने परम पूज्य सदगुरु के पदारविंद के पास जाकर, उनके जीवनदायी चरणों में साष्टांग प्रणाम करके पावन चरणों का पूजन एवं ध्यान करना चाहिए. सदगुरु के यशःकारी चरणों की सेवा में जीवन अर्पण करके और उनके दैवी चरणों की धूलि बनना चाहिए. ऐसे गुरु भक्त हठयोगी, लययोगी और राजयोगियों से ज्यादा सरलतापूर्वक सत्य स्वरुप का साक्षात्कार करके धन्य हो जाता है. सदगुरु के दैवी आत्मसमर्पण करनेवाले को निश्चिन्तता, निर्भयता और आनंद सहजता से प्राप्त होता है. सदगुरु के प्रति भक्ति इस योग का सबसे महत्वपूर्ण अंग है.गुरु भक्ति योग का अभ्यास मने गुरु के प्रति शुद्ध उत्कट प्रेम. ईमानदारी के सिवाय गुरु भक्ति योग का बिलकुल प्रगति नहीं हो सकती. गुरु का अखंड श्रद्धा गुरु भक्ति योग रुपी वृक्ष का मूल है. गुरु भक्ति योग का अभ्यास सद्गुरु की निगरानी में करना आवश्यक होता है.
गुरु भक्ति योग ले अभ्यास में गुरुसेवा सर्वस्व है.जो शिष्य चार प्रकार के साधनों से सज्ज है वही ईश्वर से अभिन्न ब्रह्मनिष्ट गुरु के समक्ष बैठने के एवं उनसे महावाक्य सुनने के लिए लायक है. चार प्रकार के साधन यानी साधनचतुष्ट्य इस प्रकार है:
१. विवेक = आत्मा-अनात्मा, नित्य-अनित्य, कर्म-अकर्म आदि का भेद समझने की शक्ति
२. वैराग्य = इन्द्रियजन्य सुख और सांसारिक विषयों से विरक्ति
३. षट्संपति = शम (वासनाओं एवं कामनाओं से मुक्त निर्मल मन की शांति), दम (इन्द्रियों पर काबू), उपरती (विषय-विकारी जीवन से उपरामता), तितिक्षा = हर एक स्थिति में स्थिरता एव, धैर्य के साथ सहनशक्ति), श्रद्धा और समाधान (बाहरी आकर्षणों से अलिप्त मन की एकाग्र स्थिति)
४. मुमुक्षुत्व = मोक्ष अथवा आत्म-साक्षात्कार के लिए तीव्र आकांक्षा.

गुरु भक्ति योग का महत्त्व
कर्मयोगी, भक्तियोगी, हठयोगी, राजयोगी आदि सन योगों की नींव गुरु भक्ति योग है. जो मनुष्य गुरु भक्ति योग के मार्ग से विमुख है वह अज्ञान, अंधकार एवं मृत्यु की परंपरा को प्राप्त होता है. गुरु भक्ति योग का अभ्यास जीवन के परम ध्येय की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है. गुरु भक्ति योग में सब योग समाविष्ट हो जाते हैं. गुरु भक्ति योग के आश्रय बिना अन्य कोई योग, जिनका आचरण अति कठिन है, उनका सम्पूर्ण अभ्यास किसीसे नहीं हो सकता. गुरु भक्ति योग में आचार्य की उपासना के द्बारा गुरुकृपा की प्राप्ति को खूब महत्त्व दिया जाता है. गुरु भक्ति योग वेद एवं उपनिषद के समय जितना प्राचीन है. गुरु भक्ति योग जीवन के सब दुःख एवं दर्दों को दूर करने का मार्ग दिखता है. गुरु भक्ति योग का मार्ग केवल योग्य शिष्य को ही तत्काल फल देनेवाला है. गुरु भक्ति योग सर्वोत्तम योग है. परम शांति का राजमार्ग गुरु भक्ति योग के अभ्यास से शुरू होता है. जो जो सिद्धियाँ संन्यास, त्याग, अन्य योग, दान एवं शुभ कार्य आदि से प्राप्त की जा सकती हैं वे सब सिद्धियाँ गुरु भक्ति योग के अभ्यास से शीघ्र प्राप्त हो सकती हैं. गुरु भक्ति योग एक विशुद्ध विज्ञान है, जो निम्न प्रकृति को वश में लाकर परम सुख प्राप्त करने की पद्धति हमें सिखाता है. गुरु भक्ति योग, गुरु सेवा योग, गुरु शरण योग आदि समानार्थी शब्द हैं. उनमें कोई अर्थभेद नहीं है. गुरु भक्ति योग ज्ञान के लिए सबसे सरल, सबसे निश्चित, सबसे शीघ्रगामी, सबसे सस्ता भयरहित मार्ग है.

इसी मार्ग के भयस्थान :
*. गुरु के पावन चरणों में साष्टांग प्रणाम करने में संकोच होना यह गुरु भक्ति योग के अभ्यास में बड़ा अवरोध है.
*. आत्म-बड़प्पन, आत्म-न्यायीपना, मिथ्या-भिमान, आत्मवंचना, दर्प, स्वच्छंदीपना, दीर्घसूत्रता, हठाग्रह, छिन्द्रान्वेषीपना, कुसंग, बेईमानी, अभिमान, विषय-वासना, क्रोध, लोभ, अहंभाव...ये सब गुरु भक्ति योग के मार्ग में आनेवाले विघ्न हैं.
*. गुरु भक्ति योग के सतत अभ्यास के द्बारा मन की चंचल प्रकृति का नाश करो.
*. गुरु भक्ति योग का शास्त्र समाधि एवं आत्म-साक्षात्कार करने हेतु ह्रदयशुद्धि प्राप्त करने के लिए गुरु सेवा पर खूब जोर देता है.
*. तमाम दुर्गुणों को निर्मूल करने का एक मात्र असरकारक उपाय है गुरु भक्ति योग का आचारण.
*. सांसारिक लोगों का संग, अधिक खाना, अभिमानी एवं राजसी प्रकृति, निद्रा, काम, क्रोध, लोभ - ये सब गुरु भक्ति योग एवं गुरु कृपा में विघ्न है.
*. शिष्य को अपने गुरु की निंदा नहीं करना चाहिए. जो गुरु की निंदा करता है वह रौरव नर्क में गिरता है.

गुरु भक्ति योग के लिए योग्यता :
गुरु रहित जीवन मृत्यु के सामान है. गुरु के पास जाने के लिए आप योग्य अधिकारी होने चाहिए. आपमें वैराग्य की भावना, विवेक, गांभीर्य, आत्मसंयम एवं सदाचार जैसा गुण होने चाहिए. अगर आप ऐसा कहेंगे कि "अच्छा गुरु कोई है ही नहीं" तो गुरु भी कहेंगे कि "कोई अच्छा शिष्य है ही नहीं". आप शिष्य कि योग्यता प्राप्त करें तो आपको सदगुरु की योग्यता, महत्ता दिखेगी और समझ में आयेगी.
*. गुरु आपके उद्धारक एवं संरक्षक हैं. सदैव उनकी पूजा करो, उनका आदर करो.
*. गुरुपद भयंकर शाप है.
*. जो सत्, चित् और परमानन्द स्वरुप हैं ऐसे गुरु को सदा साष्टांग प्रणाम करो.
*. शिष्य को गुरु की मूर्ति एवं उनके पावन चरणों को सदा स्मरण में रखना चाहिए. गुरु के चरणों की पूजा ही श्रेष्ट पूजा है. गुरु के पवित्र नाम का सदा जप करना चाहिए. इसीमें साधना का रहस्य निहित है.
*. शिष्य को गुरु की चरणों की पूजा करनी चाहिए क्योंकि गुरु के चरणों में ही ब्रह्माण्ड का वास है.
*. गुरु के चरणामृत से संसारसागर सुख जाता है और मनुष्य आवश्यक आत्मसम्पत्ति प्राप्त कर सकता है.
*. गुरु की चरणामृत शिष्य की तृषा शांत का सकता है.
*. जब आप ध्यान करने बैठें तब अपने गुरु का एवं पूर्वकालीन सब संतों का स्मरण करें. आपको उनके आशीर्वाद प्राप्त होंगे.
*. गुरु एवं महात्माओं के ज्ञान के शब्द सुनें और उसका अनुसरण करें.
*. शास्त्र एवं गुरु के द्बारा निर्दिष्ट शुभ कर्म करें.
*. श्रद्धा माने शास्त्रों में, गुरु के शब्दों में, ईश्वर में और अपने आप में विश्वास.
*. किसी भी प्रकार के फल की अपेक्षा से रहित होकर गुरु की सेवा करना यह सर्वोच्च साधना है.
*. जितनी भक्ति भावना प्रभु के प्रति रखनी चाहिए उतनी ही गुरु के प्रति रखो, तभी सत्य की अनुभूति होगी.
*. गुरु महाराज के प्रति संपूर्णतः आज्ञापालन का भावः शिष्यत्व की नींव है.
*. गुरु से मिलने की उत्कट इच्छा और उनकी सेवा करने की तीव्र आकांक्षा मुमुक्षुत्व की निशानी है.
*. जो आखें गुरु के चरणकमलों का सौंदर्य नहीं देख सकती वे आखें सचमुच अंध हैं.
*. जो कान गुरु की लीला की महिमा नहीं सुनते वे कान सचमुच बहरे हैं.
*. भवसागर को पार करने के लिए गुरु के सत्संग जैसी और कोई सुरक्षित नौका नहीं है.
*. गुरु अवज्ञा महापाप है. गुरु की आज्ञा का पालन उनके सम्मान करने से भी बढ़कर है.
*. गुरु के द्बारा निर्दिष्ट पद्धति कभी कभी शिष्य की रूचि को तत्काल अनुकूल न भी हो,फिर भी उसे श्रद्धा रखना चाहिए कि वह उसके हित और लाभ के लिए है.
*. मनुस्मृति में कहा गया है कि शिष्यों को सदा वेदाध्ययन में निमग्न रहना चाहिए. परम श्रद्धा एवं भक्तिभावपूर्वक सदगुरु कि सेवा के दौरान शिष्य को मदिरा, मांस, तेल, इत्र, स्त्री, स्वादु भोजन, चेतन प्राणियों को हानि पहुँचाना, काम, क्रोध, लोभ, नृत्य, गान, क्रीडा, वाजिन्त्र बजाना, रंग, गपशप लगाना, निंदा करना, अति निंद्रा लेना आदि से अलिप्त रहना चाहिए. उसे असत्य नहीं बोलना चाहिए.

योग का अभ्यास गुरु के सान्निध्य में करना चाहिए. विशेषतः तंत्रयोग के बारे में यह बात अत्यंत आवश्यक है. साधक कौन सी कक्षा का है, यह निश्चित करना एवं उसके लिए योग्य साधना करना गुरु का कार्य है. आजकल साधकों में एक ऐसा खतरनाक एवं गलत ख्याल प्रवर्तमान है कि वे साधना के प्रारंभ में ही उच्च प्रकार का योग साधने के लिए काफी योग्यता रखते हैं. प्रायः सब साधकों का जल्दी पतन होता है इसका यही कारण है. इसीसे सिद्ध होता है कि अभी वह योग साधना के लिए तैयार नहीं है.
गुरु और कोई नहीं हैं अपितु साधक कि उन्नति के लिए विश्व में अवतरित परात्पर साधक जगत जननी दिव्य माता स्वयं ही हैं. गुरु को देव मनो, तभी आपको वास्तविक लाभ होगा. गुरु कि अथक सेवा करो. वे स्वयं ही आप पर दीक्षा के सर्वश्रेष्ट आशीर्वाद बरसाएँगे.
गुरु मन्त्र प्रदान करते हैं यह दीक्षा कहलाती है. दीक्षा के द्बारा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है, पापों का विनाश होता है. जिस प्रकार एक ज्योति से दूसरी ज्योति प्रज्ज्वलित होती है उसी प्रकार गुरु मन्त्र के रूप में अपनी दिव्य शक्ति शिष्य में संक्रमित करते हैं. शिष्य उपवास करता है, ब्रह्मचर्य का पालन करता है और गुरु से मन्त्र ग्रहण करता है. शिष्य को यह जर्रोर याद रखना चाहिए कि गुरु मन्त्र प्राप्त करने के बाद उनके द्बारा किया गया पुण्य का दसवां हिस्सा गुरु के भाग में जाता है, तो पाप भी जरूर जायेगा, तो हमेशा इस बात को ध्यान में रखे और सत्य का मार्ग पर चलें. दीक्षा के रहस्य का पर्दा हट जाता है और शिष्य वेदशास्त्रों के गूढ़ रहस्य समझने में शक्तिमान बन जाता है. सामान्यतः ये रहस्य ये गूढ़ भाषा में छुपे हुए होते हैं. खुद ही अभ्यास करने से वे रहस्य प्रकट नहीं होते. खुद ही अभ्यास करने से तो मनुष्य अधिक अज्ञान में गर्क होता है. केवल गुरु ही आपको शास्त्राभ्यास के लिए योग्य दृष्टि दीक्षा के द्बारा करते हैं. गुरु अपनी आत्म साक्षात्कार कि ज्योति का प्रकाश उन शास्त्रों के सत्य पर डालेंगे और वे सत्य आपको शीघ्र ही समझ में आ जाएँगी.

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मन्त्र दीक्षा के नियम :
गुरु में सम्पूर्ण श्रद्धा तथा विश्वास रखना चाहिए तथा शिष्य को पूर्णरूपेण उनके प्रति आत्मसमर्पण करना चाहिए. दीक्षा काल में गुरु के द्बारा दिये गये तमाम निर्देशों का पूर्ण रूप से पलान करना चाहिए. यदि गुरु ने विशेष नियमों की चर्चा न की हो तो आगे दिये गये सर्व सामान्य नियमों का पालन करना चाहिए :
१. मन्त्रजप से कलयुग में इश्वर-साक्षात्कार सिद्ध होता है, इस बात पर विश्वास रखना चाहिए.
२. मंत्रदीक्षा की क्रिया एक अत्यंत पवित्र क्रिया है, उसे मनोरंजन का साधना नहीं मन्ना चाहिए. अन्य की देखादेखी दीक्षा ग्रहण करना उचित नहीं. अपने मन को स्थिर और सुदृढ़ करने के पश्चात् गुरु की शरण में जाना चाहिए.
३. मन्त्र को ही भगवान समझना चाहिए तथा गुरु में ईश्वर का प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहिए.
४. मंत्रदीक्षा को सांसारिक सुख-प्राप्ति का माध्यम नहीं बनाना चाहिए, भगवत्प्राप्ति का माध्यम बनाना चाहिए.
५. मंत्रदीक्षा के अनन्तर मंत्रजप को छोड़ देना घोर अपराध है, इससे मन्त्र का घोर अपमान होता है तथा साधक को हानि होने की सम्भावना भी रहती है.
६. साधक को आसुरी प्रवृत्तियाँ - काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष आदि का त्याग करके दैवी संपत्ति सेवा, त्याग, दान, प्रेम, क्षमा, विनम्रता आदि गुणों को धारण करने का प्रयत्न करते रहना चाहिए.
७. गृहस्थ को व्यवहार की दृष्टि से अपना कर्त्तव्य आवश्यक मानकर पूरा करना चाहिए, परन्तु उसे गौण कार्य समझना चाहिए. समग्र परिवार के जीवन को आध्यात्मिक बनाने का प्रयत्न करना चाहिए.
८. मन, वचन तथा कर्म से सत्य, अहिंसा तथा ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए.
९. प्रति सप्ताह मंत्रदीक्षा ग्रहण किये गये दिन एक वक़्त फलाहार पे रहना चाहिए और वर्ष के अंत में उस दिन उपवास रखना चाहिए.
१०. भगवान को निराकार-निर्गुण और साकर-सगुण दोनों स्वरूपों में देखना चाहिए. ईश्वर को अनेक रूपों में जानकार श्रीराम, श्रीकृष्ण, शंकरजी, गणेशजी, विष्णु भगवान, दुर्गा, लक्ष्मी इत्यादि किसी भी देवी-देवता में विभेद नहीं करना चाहिए. सभी के इष्टदेव सर्वव्यापक, सर्वज्ञ सभी के आत्मा में स्थित तथा सर्वान्तर्यामी हैं, अन्तः दूसरों के देवता के प्रति विरोधभाव प्रकट नहीं करना चाहिए.
११. अपना गुरु मन्त्र गुप्त रखना चाहिए. लिखित मंत्रजप करना चाहिए तथा उसे किसी पवित्र स्थान में सुरक्षित रखना चाहिए. इससे वातावरण शुद्ध रहता है.
१२. पति-पत्नी यदि एक ही गुरु की दीक्षा लें तो यह अति उत्तम है, परन्तु अनिवार्य नहीं है.
१३. मंत्रजप के लिए पूजा का एक कमरा अथवा कोई स्थान अलग रखना संभव हो तो उत्तम है. उस स्थान को अपवित्र नहीं करना चाहिए.
१४. प्रत्येक समय अपने गुरु तथा इष्टदेव की उपस्थिति का अनुभव करते रहने चाहिए.
१५. मंत्र की शक्ति पर विश्वास रखना चाहिए. उससे सारे विघ्नों का निवारण हो जाता है.
१६. प्रतिदिन कम से कम ११ माला का जप करना चाहिए. प्रातः और संध्याकाल को नियमानुसार जप करना चाहिए.
१७. माला फिराते समय तर्जनी, अंगूठे के पास की तथा कनिष्ठिका (छोटी) उँगली का उपयोग नहीं करना चाहिए. माला नाभि के नीचे जाकर लटकती हुई नहीं रखनी चाहिए. यदि संभव हो तो किसी वस्त्र (गौमुखी) में रखकर माला फिराना चाहिए. सुमेरु के मनके को (मुख्य मनके को) पार करके माला नहीं फेरना चाहिए. माला फेरते समय सुमेरु तक पहुँचकर पुनः माला घुमाकर ही दूसरी माला का प्रारंभ करना चाहिए.
१८. अंत में तो ऐसी स्थिति में आ जनि चाहिए कि निरंतर उठते-बैठते, खाते-पीते, चलते, काम करते तथा सोते समय भी जप चलते रहना चाहिए.
आप सभी को गुरुदेव का अनुग्रह प्राप्त हो, यह हार्दिक कामना है. आप सभी मंत्रजप के द्बारा इच्छानुसार लक्ष्य प्राप्त करने में संपूर्णतः सफल हों, ईश्वर आपको शांति, आनंद समृद्धि तथा आध्यात्मिक प्रगति प्रदान करें. यही प्रार्थना है.

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जप के नियम :
१. जहाँ तक संभव हो वहाँ तक गुरु द्बारा प्राप्त मंत्र की अथवा किसी भी मंत्र की अथवा परमात्मा की किसी भी एक नाम की १ से २०० माला जप करो.
२. रुद्राक्ष अथवा तुलसी की माला का उपयोग करो.
३. माला फिराने के लिए दाएँ हाथ के अंगूठे और बिचली (मध्यमा) या अनामिका ऊँगली का ही उपयोग करो.
४. माला नाभि के नीचे नहीं लटकनी चाहिए. मलयुक्त दायाँ हाथ ह्रदय के पास अथवा नाक के पास रखो.
५. माला ढंके रखो, जिससे वह तुम्हें या अन्य के देखने में न आये. गौमुखी अथवा स्वच्छ वस्त्र का उपयोग करो.
६. एक माला का जप पूरा हो, फिर माला को घुमा दो. सुमेरु के मनके को लांघना नहीं चाहिए.
७. जहाँ तक संभव हो वहाँ तक मानसिक जप करो. यदि मन चंचल हो जाय तो जप जितने जल्दी हो सके, प्रारंभ कर दो.
८. प्रातः काल जप के लिए बैठने के पूर्व स्नान करना उचित है. मध्यान्ह अथवा संध्या काल में यह कार्य जरूरी नहीं, परन्तु संभव हो तो हाथ-पैर अवश्य धो लेना चाहिए. जब कभी समय मिले जप करते रहो.
९. जप के साथ या तो अपने आराध्य देव का ध्यान करो अथवा तो प्राणायाम करो. अपने आराध्य देव का चित्र अथवा प्रतिमा अपने सम्मुख रखो. सबसे उचित है, सदगुरु के चरणों का ध्यान.
१०. जब तुम जप का रहे हो, उस समय मंत्र के अर्थ पर विचार करते रहो.
११. मंत्र के प्रत्येक अक्षर का बराबर सच्चे रूप में उच्चारण करो.
१२. मंत्रजप न तो बहुत जल्दी और न ही तो बहुत धीरे करो. जब तुम्हारा मन चंचल बन जाय तब अपने जप की गति बढा दो.
१३. जप करते समय मौन धारण करो और उस समय अपने सांसारिक कार्यों के साथ सम्बन्ध न रखो.
१४. पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुहँ रखो. जब तक हो सके तब तक प्रतिदिन एक ही स्थान पर एक ही समय जप के लिए आसनस्थ होकर बैठो. मंदिर, नदी का किनारा अथवा बरगद, पीपल के वृक्ष की नीचे की जगह जप करने के लिए योग्य स्थान है.
१५. अपने गुरु मंत्र को सबके सामने प्रकट न करो.
१६. जब तक जप कर रहे हो उस समय ऐसा अनुभव करो कि भगवन अथवा आपके गुरु की करुणा से तुम्हारा ह्रदय निर्मल होता जा रहा है ओर चित्त सुदृढ बन रहा है.
१७. जप का नियमित हिसाब रखो. उसकी संख्या को क्रमशः धीरे धीरे बढ़ाने का प्रयत्न करो.
१८. एक मुख्य बात - आप के द्बारा प्राप्त गुरु मंत्र का पुण्य का दसवां हिस्सा आपके गुरु का प्राप्त होता है ओर आपके द्बारा किया गया पाप का भी दसवां हिस्सा भी, तो आप सदा यह ख्याल में रखना चाहिए की हमे हमेशा सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए.

बाबा फरीद की गुरुभक्ति

पाकिस्तान में बाबा फरीद नाम के एक फकीर हो गये। वे अनन्य गुरुभक्त थे। गुरुजी की सेवा में ही उनका सारा समय व्यतीत होता था।

एक बार उनके गुरु ख्वाजा बहाउद्दीन ने उनको किसी खास काम के लिए मुलतान भेजा। उन दिनों वहाँ शम्सतबरेज के शिष्यों ने गुरु के नाम का दरवाजा बनाया था और घोषणा की थी कि आज इस दरवाजे से जो गुजरेगा वह जरूर स्वर्ग में जायेगा। हजारों फकीरों दरवाजे से गुजर रहे थे। नश्वर शरीर के त्याग के बाद स्वर्ग में स्थान मिलेगा ऐसी सबको आशा थी। फरीद को भी उनके मित्र फकीरों ने दरवाजे से गुजरने के लिए खूब समझाया, परंतु फरीद तो उनको जैसे-तैसे समझा-पटाकर अपना काम पूरा करके, बिना दरवाजे से गुजरे ही अपने गुरुदेव के चरणों में पहुँच गये।

सर्वान्तर्यामी गुरुदेव ने उनसे मुलतान के समाचार पूछे और कोई विशेष घटना हो तो बताने के लिए कहा। फरीद ने शाह शम्सतबरेज के दरवाजे का वर्णन करके सारी हकीकत सुना दी।

गुरुदेव बोलेः "मैं भी वहीं होता तो उस पवित्र दरवाजे से गुजरता। तुम कितने भाग्यशाली हो फरीद कि तुमको उस पवित्र दरवाजे से गुजरने का सुअवसर प्राप्त हुआ !"

सदगुरु की लीला बड़ी अजीबो गरीब होती है। शिष्य को पता भी नहीं चलता और वे उसकी कसौटी कर लेते हैं। फरीद तो सतशिष्य थे। उनको अपने गुरुदेव के प्रति अनन्य भक्ति थी।

गुरुदेव के शब्द सुनकर बोलेः "कृपानाथ ! मैं तो उस दरवाजे से नहीं गुजरा। मैं तो केवल आपके दरवाजे से ही गुजरूँगा। एक बार मैंने आपकी शरण ले ली है तो अब किसी और की शरण मुझे नहीं जाना है।"

यह सुनकर ख्वाजा बहाउद्दीन की आँखों में प्रेम उमड़ आया। शिष्य की दृढ श्रद्धा और अनन्य शरणागति देखकर उसे उन्होंने छाती से लगा लिया। उनके हृदय की गहराई से आशीर्वाद के शब्द निकल पड़ेः "फरीद ! शम्सतबरेज का दरवाजा तो केवल एक ही दिन खुला था, परंतु तुम्हारा दरवाजा तो ऐसा खुलेगा कि उसमें से जो हर गुरुवार को गुजरेगा वह सीधा स्वर्ग में जायेगा।"

आज भी पश्चिमी पाकिस्तान के पाक पट्टन कस्बे में बने हुए बाबा फरीद के दरवाजे में से हर गुरुवार के गुजरकर हजारों यात्री अपने को धन्यभागी मानते हैं। यह है गुरुदेव के प्रति अनन्य निष्ठा की महिमा ! धन्यवाद है बाबा फरीद जैसे सतशिष्यों को, जिन्होंने सदगुरु के हाथों में अपने जीवन की बागडोर हमेशा के लिए सौंप दी और निश्चिंत हो गये।

आत्मसाक्षात्कार या तत्त्वबोध


आत्मसाक्षात्कार या तत्त्वबोध तब तक संभव नहीं, जब तक ब्रह्मवेत्ता महापुरुष साधक के अन्तःकरण का संचालन नहीं करते। आत्मवेत्ता महापुरुष जब हमारे अन्तःकरण का संचालन करते हैं, तभी अन्तःकरण परमात्म-तत्त्व में स्थित हो सकता है, नहीं तो किसी अवस्था में, किसी मान्यता में, किसी वृत्ति में, किसी आदत में साधक रुक जाता है। रोज आसन किये, प्राणायाम किये, शरीर स्वस्थ रहा, सुख-दुःख के प्रसंग में चोटें कम लगीं, घर में आसक्ति कम हुई, पर व्यक्तित्व बना रहेगा। उससे आगे जाना है तो महापुरुषों के आगे बिल्कुल 'मर जाना' पड़ेगा। ब्रह्मवेत्ता सदगुरु के हाथों में जब हमारे 'मैं' की लगाम आती है, तब आगे की यात्रा आती है।

देवर्षि नारदजी धर्मराज युधिष्ठिर से कहते हैं- "हृदयों में ज्ञान का दीपक जलानेवाले गुरुदेव साक्षात् भगवान ही हैं। जो दुर्बुद्धि पुरुष उन्हें मनुष्य समझता है, उसका समस्त शास्त्र-श्रवण हाथी के स्नान के समान व्यर्थ है।
बड़े-बड़े योगेश्वर जिनके चरणकमलों का अनुसंधान करते रहते हैं, प्रकृति और पुरुष के अधीश्वर वे स्वयं भगवान ही गुरुदेव के रूप में प्रकट हैं। इन्हें लोग भ्रम से मनुष्य मानते हैं।"

गुरुभक्ति सुखद , सुलभ और सुगम साधन
 श्री श्री १०८श्रीस्वामी सतगुरु सरनानंदजी महाराज परमहंस)  
       अतः भक्ति मुक्ति के जिज्ञासु का प्रथम कर्तव्य है कि वह सद्‌गुरु की खोज करे, उनकी प्रार्थना करके उनकी शरण प्राप्त करके उनसे नाम तत्त्व का उपदेश ले तथा उनके द्वारा बतायी विधि के उनुसार प्रेम और भक्ति के साथ उनका भजन- सुमिरन और सेवा करे। पूर्ण पुरूष सद्‌गुरु की छ्त्रछाया में जाकर जीव पूर्णकाम हो जाता है, उसे कुछ पाना शेष नहीं रहता सन्तवाणी है--
           पूर्ण पुरूष सद्‌गुरु मिले जागे भाग हमार ।
            किरपा कर सत्गुरु दिया नाम अमोलक सार ॥
            ऐसी अनुकम्पा करी सद्‌गुरु पूरण काम ।
            पल पल सुमिरे दास यह सत्गुरु तुमरो नाम ॥
वह परम पावन योगिराज श्री सद्‌गुरु महाराज निरन्तर जीव को परमात्मा में या अपने साथ लगाता हुआ सुखपूर्वक अपनी प्राप्ति करा कर भक्त को अनन्त आनन्द का अनुभव कराते रहते हैं। धन्य हैं वे जिज्ञासु भक्त जो ह्रदय में निरन्तर पूरी श्रद्धा से सद्‌गुरु महराज के नाम का भजन-सुमिरन तथा सेवा करते हुये अपने जीवन को सार्थक बना रहे हैं।
              पर ब्रह्म सत्गुरु मिले, सँवर गई तकदीर ।
              दासनदास की मिट गई जन्म जन्म की पीर ॥
सद्‌गुरुदेव की प्रशस्ति में सन्त ज्ञानेश्वर ने कहा है कि ऐसे सद्‌गुरु को कोटि कोटि प्रणाम है जो परमात्मा की प्राप्ति के साधन रूपी जंगल के बसंत,ब्रह्मविद्या के मंगलसूत्र और अकारण करूणा की प्रत्यक्ष मूर्ति हैं। श्रीसद्‌गुरु अविद्या के वन जीव-भाव को भोगने वाले चैतन्य स्वरूप जीव की पुकार पर करूणा से द्रवित हो उठते हैं। जिनकी कृपादृष्टि होने पर बन्धन मोक्ष में बदल जाता है और ज्ञानार्थी ज्ञानमय हो जाता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के यहाँ बड़े-छोटे का विचार नहीं है, वे सबको एकभाव से कल्याण मार्ग पर लगाकर उनका उद्धार करते हैं। सद्‌गुरु के नाम-भजन, सेवा से ही मन निर्मल बनता है और वायु की गति के समान चंचल मन स्थिर हो जाता है। जीव को सच्चे सुख और शान्ति का अनुभव होता है। सन्तवाणी है--
         चंचल मन थिर ना रहे लाख कोई समझावे ।
         गुरु शब्द का चाबुक लागे तब यह वस में आवे ॥
         पारब्रह्म पूरण गुरु धराधम पर आते ।
         देकर के निज नाम का अंकुश मन पर वार लगाते ॥
        जो कोई इनकी शरण में जाये मुक्ति भक्ति बतलाते ।
        सुमिरन सेवा ध्यान भजन का सच्चा नियम सिखाते ॥
       इस पर जो भी अमल है करता मन वश में हो जाये ।
       जीव शान्ति, सुख,  परमान्द में वास निरन्तर पावे ॥
परमपूज्य स्वामीजी कहा करते थे कि करने वाले के लिये गुरुभक्ति का मार्ग बहुत सरल है, बस पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ सद्‌गुरु नाम के भजन- सुमिरन में निर्देशित विधि के अनुसार लीन रहे तथा गुरु की आज्ञा का पालन और उनकी सेवा में कभी भी तनिक भी कमी न आने दे। इतना सध जाने पर तो सद्‌गुरु की कृपा प्राप्त करने में कोई कठिनाई शेष नहीं रहती। यह ऐसा मार्ग है जिसमें केवल प्रेम से लगे रहने की आवश्यकता है। सद्‌गुरु-शरण में जाने के बाद फिर कहीं जाना है, वहीं हर कामना पूरी हो जायेंगी।
            सन्त के द्वार पर पड़ा मनमूरख तूँ कौन सी आस दस द्वार धावै ।
            दयानिधि दया की दृष्टि जब फेरिहैं, सहज ही मुक्ति फल हाथ आवै ॥
            स्वर्ग और सिद्धि की चाह को छोड़कर सन्त के चरण जो भक्ति लावै ।
            एक ना एक दिन पाइहै मुक्तिफल, नाहिं सन्देह संपूर्ण गावै ॥
सन्तमत में सद्‌गुरु की आवश्यकता, उनमें पूर्ण विश्वास, अनन्य प्रेम और उनकी निःस्वार्थ सेवा को ही साधना के सबसे आवश्यक अंग के रूप में स्वीकार किया गया है। सद्‌गुरु साधना के केन्द्र और परिधि दोनों होते है, इसलिये साधना के श्री गणेश से लेकर समापन तक प्रेरक से लेकर स्वयं साध्य बन जाने तक साथ-साथ रहते हैं। सद्‌गुरु की भक्ति के सहारे उनकी मौज के अनुसार चलना वाला सेवक अवश्य ही मुक्ति का अधिकारी बन जाता है। अतः सच्चा सुख, सच्ची शान्ति और परम आनंद की प्राप्ति सद्‌गुरु की ही शरण में संभव है। नाम भक्ति से रहित व्यक्ति तीनों लोको का राज्य प्राप्त कर लेने पर भी कभी न सुखी रह सकता है और न एक क्षण के लिये भी उसे शान्ति प्राप्त हो सकती है।
            प्रभु का नाम भुलाकर जग में कौन चैन सुख पायेगा ।
            तब सुख इच्छा होगी पूरी जब दिल में नाम बसायेगा ॥
अन्यत्र कहा गया है--
            भक्ति सुख का मूल है भक्ति सुख की खान ।
            जाके मन भक्ति बसे पावे पद निर्वान ॥
सद्‌गुरु की भक्ति में किसी प्रकार की बाधा व्यवधान नहीं उत्पन्न कर सकती क्योंकि सदा रहने वाले गुरुदेव सदा भक्त की रक्षा किया करते हैं। इसकी निर्बाधता पर भक्त शिरोमणि काकभुशुण्डि जी ने कहा है कि भक्ति सुन्दर चिन्तामणि है, यह जिसके ह्रदय में बस जाती है उसके ह्रदय में दिन रात ज्ञान का प्रकाश जगमगाता रहता है। इस मणि के प्रकाश को दीपक की भाँति तेल-बाती की आवश्यकता नहीं, इसके लिये किसी सहायक साम्रगी की आवश्यकता नहीं, साथ ही इसकी यह विशेषता है कि इसे मोह, लोभ, माया रूपी झंझावात बुझा नहीं सकते तथा इसके प्रभाव से मोह रूपी दारिद्र्य निकट नहीं आ पाता। तात्पर्य यह है कि जिनका ह्रदय गुरु के प्रति अनन्य भति भाव से भरा है, उस पर सांसारिक आसक्तियों का प्रभाव नहीं पड़ता, इसलिये भक्ति मार्ग बाधा रहित होता है।
         राम भगति चिन्तामनि सुन्दर । बसई गरुड़ जाके उर अन्तर ॥
         परम प्रकास रूप दिन राती । नहिं कछु चाहिय दिया घृत बाती ॥
         मोह दरिद्र निकट नहिं आवा । लोभ बात नहिं ताहि बुझावा ॥
सद्‌गुरु भक्ति से प्रकाशित ह्रदय अज्ञान मुक्त हो जाता है। भक्त के ज्ञान नेत्र खुल जाते हैं। इसी से कहा गया है कि ज्ञान- भक्ति का अनुगामी होता है जबकि भक्ति स्वतन्त्र होती है। ज्ञान- भक्ति से युक्त ह्रदय सांसारिक आसक्ति रूपी मानस रोगों से अप्रयास मुक्त हो जाता है, वह हर प्रकार से स्वस्थ मन, स्वस्थ आत्मा होता है। गुरु भक्त में संसार का कोई दुःख नहीं व्यापता। दुख-भन्जन केवल नाम है, परन्तु अज्ञानी पुरूष इसका आश्रय न लेकर दुःख निवारण के लिये निरर्थक नाना प्रकार के कर्मकाण्डों का अनुष्ठान किया करते हैं। सुखी वही है जिसे सद्‌गुरु-नाम का मजबूत सहारा मिल गया है। नानकजी ने कहा है--
             नानक दुखिया सब संसार । सुखी वही जो नाम अधार ॥
             श्रुति, पुराण तथा सभी धर्मग्रन्थ यही कहते हैं कि श्रीसद्‌गुरु महाराज के भजन-सुमिरन और सेवा-भक्ति के बिना सुख की प्राप्ति कभी भी नहीं हो सकती। रामचरित मानस में कहा गया है--
          श्रुति, पुराण सब ग्रन्थ कहाहीं । रघुपति भगति बिना सुख नाहीं ॥
सन्त महापुरूष कहते है कि सद्‌गुरु के चरण कमल से प्रवाहित भक्ति-रूपी गंगा में जो भक्त श्रद्धा के साथ गोते लगाता है, उसके सभी दोष मिट जाते हैं और वह पाप रहित हो जाता है। मोह और अज्ञान का नाश हो जाता है, आत्मज्ञान का उदय होता है तथा मन के सभी संशय दूर हो जाते हैं, ऐसा सद्‌गुरुदेव की भक्ति का प्रताप है। पूर्व कर्मों के परिणाम स्वरूप एकत्रित पाप, सांसारिक वासनायें, जिनके कारण मनुष्य दुख भोगता है, सब गुरुकृपा से ही निर्बीज होते हैं और तभी सुख की प्राप्ति होती है। बिना सन्त-सद्‌गुरु के अनुकूल हुये, बिना उनकी कृपा के सुख-प्राप्ति असम्भव है। सद्‌गुरुभक्ति ही सभी सुखों का मूल है। रामचरित मानस में कहा गया है--
     तात भक्ति अनुपम सुखमूला । मिलई जो सन्त होहिं अनुकूला ॥
शाश्वत सुख देने वाली भक्ति-रूपी अमूल्य निधि बिना सद्‌गुरु की कृपा के कदापि नहीं मिल सकती। अतः सभी साधनों का सहारा छोड़कर केवल एक सद्‌गुरु की शरण ग्रहण करके उनके नाम भजन-सुमिरन और सेवा में रत हो जाना ही भक्ति प्राप्त का एकमात्र साधन है,अन्य सभी साधनाओं का फल भी इस गुरुभक्ति में ही समाया हुआ है। काकभुशुण्डि जी द्वारा गरुड़ से यही विचार व्यक्त किया गया है--
      सब कर फल हरि भगति सुहाई । बिनु सतसंगा न काहू पाई ॥
      अस बिचारि जोई कर सतसंगा । रामभगति तेहि सुलभ विहंगा ॥
जिस जिज्ञासु के ह्रदय में जीवोद्धारक गुरुभक्ति की चाह हो, उसके लिये यही श्रेयष्कर है कि वह यथा शीघ्र सन्त-सद्‌गुरु की शरण में जाकर उनकी सेवा में लग जाय। निःस्वार्थ शुद्ध सेवा से कोमल ह्रदय सन्त अवश्य द्रवित होते हैं और वे अपने सेवक को भक्ति की अनमोल सम्पदा से सम्पन्न कर देते हैं। उस भक्त का जीवन सफल हो जाता है। इसलिये सन्त-सद्‌गुरु की सविनय प्रार्थना की जाती है--
        अब तो तेरे नाम में ही मग्न यह दास रहे।
        यूँ ही नजरें करम तेरी मुझ पे खास रहे ।
        भूले से भी भूले न कभी तेरा ध्यान प्रभु॥
    हे मेरे स्वामी! दीन बन्धु, दीनानाथ मेरे ह्रदय में आपके नाम की दौलत पाने की तमन्ना बराबर बनी रहती है। आपसे यही प्रार्थना है कि आप ऐसी कृपा करें कि मेरा मन सदा आपके भजन-सुमिरन और सेवा में लगा रहे, अन्यत्र कहीं न जाय। आप मुझे मानसिक शान्ति दें और सांसारिक मोह-माया के आक्रमण से मेरी रक्षा करें। आपके दर्शन की लालसा सदा मेरे ह्रदय में बनी रहे। तथा सद्‌गुरु विषयक निर्मल ज्ञान से मेरा ह्रदय प्रकाशित रहे। आपका दर्शन करने, आपकी सेवा करने की ऐसी प्यास लगी रहे जो कभी कम न हो।

सर्वश्रेष्ठ गुरुभक्त एकलव्य

एक भील बालक जिसका नाम एकलव्य था। उसे धनुष-बाण चलाना बहुत प्रिय था। वह धनुर्विद्या सीखना चाहता था। इसीलिए वह गुरु द्रोणाचार्य के पास पहुंचा। परंतु जब द्रोणाचार्य को मालूम हुआ कि यह बालक भील है तब उन्होंने उसे शिक्षा देने से इंकार कर दिया।
एकलव्य निराश होकर वहां से लौट आया परंतु उसने हार नहीं मानी और गुरु द्रोण की मूर्ति बनाई और उसके आगे अभ्यास करने लगा।
एक दिन गुरु द्रोण और पांडव जंगल से गुजर रहे थे। उनके साथ उनका एक कुत्ता भी था। कुत्ता भौंकते हुए आगे-आगे चल रहा था। कुत्ता भौंकते हुए थोड़ी  आगे चला गया और जब वह वापस आया तो उसका मुंह बाणों से भरा हुआ था। यह देखकर गुरु आश्चर्यचकित रह गए कि बाण इतनी कुशलता से मारे गए थे कि कुत्ते मुंह से रक्त की बूंद भी नहीं निकली।
द्रोणाचार्य ने सभी शिष्यों को उस कुशल धनुर्धर की खोज करने की आज्ञा दी। जल्द ही उस धनुर्धर को खोज लिया गया। धनुर्धर वही भील बालक एकलव्य था, उसने बताया कि गुरु द्रोणाचार्य द्वारा धनुर्विद्या सीखाने से इंकार करने के बाद मैंने इनकी मूर्ति बनाकर उसी से प्रेरणा पाई है। द्रोणाचार्य चूंकि अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाना चाहते थे, इसलिए अर्जुन को भी पीछे छोडऩे वाले एकलव्य से उन्होंने गुरु दक्षिणा में अंगूठा मांग लिया। एकलव्य ने बिना विचार किए अपने गुरु को गुरुदक्षिणा में अंगूठा काटकर दे दिया।
आज भी एकलव्य की गुरुभक्ति से बढ़कर ओर कोई उदाहरण दिखाई नहीं देता।

कबीर:गुरु भक्ति

सत गहे, सतगुरु को चीन्हे, सतनाम विश्वासा,
कहै कबीर साधन हितकारी, हम साधन के दासा।

वे कहते, प्रत्येक मानव को गुरु भक्ति और साधन का अभ्यास करना चाहिए। इस सत्य की प्राप्ति से सब अवरोध समाप्त हो जाते हैं।

जो सुख राम भजन में, वह सुख नहीं अमीरी में।

सुख का आधार धन- संपत्ति नहीं है। इसके अभाव में भी मानव सुख- शांति का जीवन जी सकता है।

चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह,
जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह।

वे कहते हैं, धरती पर सभी कष्टों की जड़ वासना है, इसके मिटते ही चिंता भी समाप्त हो जाती है और शांति स्वमेव आने लगती है। कबीर के कहने का तात्पर्य है कि पूजा- पाठ साधना कोई शुष्क चीज नहीं है, बल्कि इसमें आनंद है, तृप्ति है और साथ ही सभी समस्याओं का समाधान। इसलिए इसको जीवन में सर्वोपरि स्थान देना चाहिए। साधना के प्रति लोगों के हृदय में आकर्षण भाव लाने हेतु उन्होंने अपना अनुभव बताया।

इस घट अंतर बाग बगीचे, इसी में सिरजन हारा,
इस घट अंतर सात समुदर इसी में नौ लख तारा।

गुरु के बताए साधन पर चलकर ध्यान का अभ्यास करने को वे कहते हैं। इससे दुखों का अंत होगा और अंतर प्रकाश मिलेगा। गुरु भक्ति रखकर साधन पथ पर चलनेवाले सभी लोगों को आंतरिक अनुभूति मिलती है।

कबीर का प्रेम
कंलि खोटा जग अंधेरा, शब्द न माने कोय,
जो कहा न माने, दे धक्का दुई और।

महात्मा कबीर किसी भी स्थिति में हार मानने वाले नहीं थे। वे गलत लोगों को ठीक रास्ते पर लाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने दो- चार धक्के खाना भी पसंद था। इस प्रकार कहा जाता है कि कबीर लौह पुरुष थे। वे मानव को प्रेम को अपनाने कहते हैं। उनका कहना है कि ईश्वर का दूसरा नाम प्रेम है। इसी तत्व को अपनाने पर जीवन की बहुत सारी समस्याएँ स्वतः सुलझ जाती है।

मैं कहता सुरजनहारी, तू राख्यो अरुझाई राखे

कबीर साहब सदा सीधे ढ़ग से जीवन जीने की कला बताते थे। उनका कहना था कि प्रेम के अभाव में यह जीवन नारकीय बन जाता है।

कबीर प्याला प्रेम का अंतर दिया लगाया,
रोम- रोम से रमि रम्या और अमल क्या लाय,
कबीर बादल प्रेम का हम पर वरस्या आई,
अतरि भीगी आत्मा, हरी भई बन आई।

यही “प्रेम’ सब कुछ है, जिसे पान कर कबीर धन्य हो गये। इस बादल रुपी प्रेम की वर्षा में स्नान कर कबीर की आत्मा तृप्त हो गई और उसका मन आनंद विभोर हो उठा। वे कहते हैं, प्रेम ही सर्व है। उसी के आधार पर व्यक्ति एक दूसरे के साथ बंधुत्व की भावना को जागृत कर सकता है। आज के परिवेश में इसी बंधुत्व की भावना के प्रसार की नितांत आवश्यकता है। कबीर साहब की वाणी आज भी हमें संदेश दे रही है कि संसार में कामयाब होने का एक मात्र मार्ग धर्म और समाज की एकता है।

हे नाथ मैँ आपको भूलूँ नही...!! हे नाथ ! आप मेरे हृदय मेँ ऐसी आग लगा देँ कि आपकी प्रीति के बिना मै जी न सकूँ.
ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुख राशि


स्वामी रामसुखदास जी महाराज
नारायण! नारायण! नारायण! नारायण! नारायण!
राम राम राम राम राम रामराम राम राम राम राम
राम राम राम राम राम रामराम राम राम राम राम
राम राम राम राम राम रामराम राम राम राम राम
श्री मन नारायण नारायण नारायण......श्री मन नारायण नारायण नारायण......
श्री मन नारायण नारायण नारायण......श्री मन नारायण नारायण नारायण...... 

ईश्वर के अंश होने के कारण हम परम आनंद को पाने के अधिकारी हैं, चेतना के उस दिव्य स्तर तक पहुंचने के अधिकारी हैं जहाँ विशुद्ध प्रेम, सुख, ज्ञान, शक्ति, पवित्रता और शांति है. सम्पूर्ण प्रकृति भी तब हमारे लिये सुखदायी हो जाती है.  इस स्थिति को केवल अनुभव किया जा सकता है यह स्थूल नहीं है अति सूक्ष्म है परम की अनुभूति अंतर को अनंत सुख से ओतप्रोत कर देती है, और परम तक ले जाने वाला कोई सदगुरु ही हो सकता है. सर्व भाव से उस सच्चिदानंद की शरण में जाने की विधि वही सिखाते हैं. हम देह नहीं हैं, देही हैं, जिसे शास्त्रों में जीव कहते हैं. जीव परमात्मा का अंश है, उसके लक्षण भी वही हैं जो परमात्मा के हैं. वह भी शाश्वत, चेतन तथा आनन्दस्वरूप है.
थोड़ी-थोड़ी देर मेँ पुकारते रहेँ-
हे नाथ ! हे मेरे नाथ ! मैँ आपको भूलूँ नहीँ ।

एक सूरदास भगवान्‌के मन्दिरमें गये तो लोगोंने उनसे कहा ‘आप कैसे आये ?’ वे बोले ‘भगवान्‌का दर्शन करनेके लिये ।’ लोगोंने पूछा ‘तुम्हारे आँखें तो हैं नहीं, दर्शन किससे करोगे ?’ वे बोले ‘दर्शनके लिये मेरे नेत्र नहीं हैं तो क्या ठाकुरजीके भी नेत्र नहीं हैं ? वे तो मेरेको देख लेंगे न ! वे मेरेको देखकर प्रसन्न हो जायँगे तो बस, हमारा काम हो गया ।’

जब भी मन मेँ दुःख,चिन्ता,भय आदि विचार आयेँ मन ही मन भगवान का ध्यान करते हुए आर्तभाव से पुकारेँ-
हे नाथ...! हे मेरे नाथ....!!

ऐसा कहने मात्रसे सब दुःख-चिन्ता आदि दूर भाग जायेँगे।भगवान का आश्रय (सहारा) मिल जायगा।एक भगवान के आश्रय मेँ ही सदा के लिए अखंड आनंद और निर्भयता है।वास्तवमेँ ईश्वर का आश्रय सदा है,सर्वत्र है।बस स्वीकारने की आवश्यकता है। इसलिए दोनो हाथ ऊपर करके-
हे नाथ! हे मेरे नाथ!!

मानो व्याकुल गजेँद्र ने नारायण को पुकारा और नारायण सुदर्शन लेकर चल पड़े हो।
भगवान से अपनेपन के समान कुछ भी नही...कुछ भी नही....हे नाथ...! हे मेरे नाथ...!!
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय

कैलाशी काशी के वासी अविनाशी मेरी सुध लीजो।
सेवक जान सदा चरनन को अपनी जान कृपा कीजो॥
तुम तो प्रभुजी सदा दयामय अवगुण मेरे सब ढकियो।
सब अपराध क्षमाकर शंकर, सबकी की विनती सुनियो॥

ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय

सतनाम जाने बिना, हंस लोक नहिं जाए।
ज्ञानी पंडित सूरमा, कर कर मुये उपाय।।