RAJ INFOTECH SYSTEM @ NETWORK

RAJ INFOTECH SYSTEM @ NETWORK
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥ हे नाथ मैँ आपको भूलूँ नही...!! हे नाथ ! आप मेरे हृदय मेँ ऐसी आग लगा देँ कि आपकी प्रीति के बिना मै जी न सकूँ.

Tuesday, February 25, 2014

गीताजीकी महीमा





स्वामी रामसुखदास जी महाराज

हे नाथ मैँ आपको भूलूँ नही...!! हे नाथ ! हे नाथ मैँ आपको भूलूँ नही...!!
आप मेरे हृदय मेँ ऐसी आग लगा देँ कि आपकी प्रीति के बिना मै जी न सकूँ.

ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुख राशि
!! श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेवाय !!

गीताजीकी महीमा
भगवद्गीता एक बहुत ही अलौकिक, विचित्र ग्रन्थ है । इसमे साधकके लिए उपयोगी पूरी सामग्री मिलती है, चाहे वह किसी भी समुदायका, किसी भी सम्प्रदायका, किसी भी वर्णका, किसी भी आश्रमका कोई व्यक्ति क्यों न हो । इसका कारण यह है की इसमें किसी समुदाय-विषेशकी निंदा या प्रशंसा नहीं है । प्रत्युत वास्तविक तत्वका ही वर्णन है । इस छोटे-से ग्रंथमें इतनी विलक्षणता है कि अपना कल्याण चाहनेवाले साधकको अपने उद्धारके लिए बहुत ही संतोषजनक उपाय मिलते हैं । अपना उद्धार चाहनेवाले सब-के-सब गीताजी के अधिकारी हैं । प्रत्येक व्यवहार मात्रमें परमार्थकी कला गीताजीमें सिखाई गयी हैं । यह एक प्रासादिक ग्रन्थ हैं । जीव संसारसे विमुख होकर भगवानके सम्मुख हो जाय और भगवानके साथ अपने नित्य सम्बन्धको पहचान लें— इसीके लिए भग्वद्गीताका अवतार हुआ है ।
जीवमात्रका मनुष्ययोनिमें जन्म केवल अपने कल्याणके लिए ही हुआ हैं । संसारमें ऐसी कोई भी परिस्थिति नहीं है, जिसमें मनुष्यका कल्याण न हो सकता हो । कारण कि परमात्मतत्त्व प्रत्येक परिस्थितिमें समानरुपसे विद्यमान है । अतः साधकके सामने कोई भी और कैसी भी परिस्थिति आये, उसका केवल सदुपयोग करना है । स्वामीजी महाराज फरमाते है कि जब गीताप्रेमी सज्जनोंने विशेष आग्रह किया, हठ किया, तब गीताके मार्मिक भावोंका अपनेको बोध हो जाय तथा और कोई मनन करे तो उसको भी इनका बोध हो जाय-- इस द्रष्टिसे गीताकी व्याख्या लिखवानेमें प्रवृति हुई । टीका लिखवाते समय 'साधकोंको शीघ्र लाभ कैसे हो' --ऐसा भाव रहा है । गीताका मनन-विचार करनेसे और गीताकी टीका लिखवानेसे मुझे बहुत आध्यात्मिक लाभ हुआ है और गीताके विषयका बहुत स्पष्ट बोध भी हुआ है । दुसरे भाई-बहन भी यदि इसका मनन करेंगे,तो उनको भी आध्यात्मिक लाभ अवश्य— ऐसी मेरी व्यक्तिगत धारणा है । गीताका मनन-विचार करनेसे लाभ होता है— इसमें मुझे कभी किंचिन्मात्र भी संदेह नहीं है ।
अतः हमारे उद्धार-कल्याणके लिए स्वामीजी महाराजजीने साधकसंजीवनीरूपी जहाज इस भवसागरसे तरनेके लिये प्रदान किया है, उसका लाभ लेकर हम सभी साधक भाई-बहने पार हो— इसी भावसे हम स्वामीजी महाराजके उपदेशोंका मनन-चिंतन करेंगे ।
गीता उपनिषदोंका सार है । पर वास्तवमें गीताकी बात उपनिषदोंसे भी विशेष है । कारणकी अपेक्षा कार्यमें विशेष गुण होते है; जैसे— आकाशमें केवल एक गुण 'शब्द' है, पर उसके कार्य वायुमें दो गुण 'शब्द और स्पर्श' हैं ।
वेद भगवान् के निःश्वास है और गीता भगवान् की वाणी है । निःश्वास तो स्वाभाविक होते है, पर गीता भगवान् ने योगमें स्थित होकर कही है । अतः वेदोंकी अपेक्षा भी गीता विशेष है ।
सभी दर्शन गीताके अर्न्तगत है, पर गीता किसी दर्शनके अर्न्तगत नहीं है । दर्शनशास्त्रमें जगत क्या है, जीव क्या है और ब्रह्म क्या है— यह पढाई होती है । परन्तु गीता पढाई नहीं कराती, प्रत्युत अनुभव कराती है ।
गीतामें किसी मतका आग्रह नहीं है, प्रत्युत केवल जीवके कल्याणका ही आग्रह है ।
मतभेद गीतामें नहीं है, प्रत्युत टिकाकारोंमें है ।
गीतामें भगवान् साधकको समग्रकी तरफ ले जाते हैं ।
सब कुछ परमात्माके ही अर्न्तगत है, परमात्माके सिवाय किंचिन्मात्र भी कुछ नहीं है— इसी भावमें सम्पूर्ण गीता है ।
गीताका तात्पर्य ‘वासुदेव सर्वंम्’ में है । सबकुछ परमात्मा ही हैं— यह खुले नेत्रोंका ध्यान है । इसमें न आँख बंद करनेकी (ध्यान) जरुरत है, न कान बंद करनेकी (नादानुसंधान) की जरुरत है, न नाक बंद करनेकी (प्राणायाम) जरुरत है ! इसमें न संयोगका असर पङता है, न वियोगका; न किसीके आनेका असर पड़ता है, न किसीके जानेका । सब कुछ परमात्मा है ही तो फिर दूसरा कहाँसे आये ? कैसे आये ?
गीता कर्मयोगको ज्ञानयोगकी अपेक्षा विशेष मानती है, कारणकी ज्ञानयोगके बिना तो कर्मयोग हो सकता है (गीता ३/२०), पर कर्मयोगाके बिना ज्ञानयोग होना कठिन है (गीता ५/६) ।
अतः साधकोंको चाहिये कि वे अपना कोई आग्रह न रखकर परम् पूज्य स्वामीजी महाराजजी द्वारा लिखवाइ हुई श्रीगीताजीकी टीका साधक-संजीवनी, गीता-प्रबोधनी एवं गीता माधुर्य पढ़ें और इसपर गहरा विचार करें तो वास्तविक तत्व उनकी समझमें आ जायगा और जो बात टीकामें नहीं आयी है, वह भी समझमें आ जायेगी !  ऐसा स्वामीजी महाराजका भाव है । अतःसभी साधकोंकी सेवामें श्रीस्वामीजी महाराजका गीताप्रेस-गोरखपुरसे प्रकाशित कल्याणकारी साहित्य एवं 1991 से 2005 के अन्तीम् प्रवचन इन्टरनेट पर उपलब्ध है, उसका लाभ उठाकर मनुष्य जन्म सफल बनायॅ ।
सदा हृदयसे...आर्तभावसे पुकारते रहो......हे नाथ ! हे मेरे नाथ ! मैं आपको भूँलूँ नहीं !!
हे नाथ मैँ आपको भूलूँ नही...!! हे नाथ ! हे नाथ मैँ आपको भूलूँ नही...!!
आप मेरे हृदय मेँ ऐसी आग लगा देँ कि आपकी प्रीति के बिना मै जी न सकूँ.

ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुख राशि
                              !! श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेवाय !!

गई बहोर गरीब नेवाजू।  सरल सबल साहिब रघुराजू।।
जपहि नामु जन आरत भारी।  मिटाई कुसंकट होहि सुखारी।।


शरणागति





शरणागति
श्रोता — ‘मामेकं शरणं व्रज’— इसमें ‘शरणं’ का क्या तात्पर्य है ?
स्वामीजी— ‘हे नाथ ! हे नाथ ! मै आपका हूँ’, हे भगवन् मैं आपका हूँ — यह तात्पर्य है । जैसे लडकी ब्याह-शादी होनेपर पतिकी हो जाती है । अब पिहरकी नहीं रही, भले ही बापके पास बैठी हो ! वह तो वहाँकी हो गई । ऐसे ही हम भगवानके हो गए, संसारके नहीं रहे । ‘हे नाथ ! मै आपका हूँ !’ —इतना होते ही भीतरसे मान लिया कि मैं संसारका, माँ-बापका, जातिका नहीं हूँ; वर्ण, आश्रम, हिंदुस्तानका नहीं हूँ । घरका, शहरका नहीं हूँ । मै हूँ ही नहीं यहाँका, मैं तो भगवानका हूँ ! — यह हो जाता है, यह शरणागति है ।
श्रोता — जैसे जगतकी मान्यता करते है, ऐसे ही भगवानकी मान्यता करनी पड़ती है ?
स्वामीजी — जगतकी मान्यता हटानी पड़ती है और भगवानकी मान्यता करनी पड़ती है, करो तो ! जगत् माना हुआ है, है नहीं ! माँ-बाप, भाई, मनुष्य केवल माना हुआ है; है नहीं, ‘कर्ताः इति मन्यते’ ! माँ को किसीने देखा नहीं है, बोलो किसीने देखा हो तो ? बापको किसीने देखा नहीं है, माना हुआ है । जब बाप बना तब तो बालककी उत्पत्ति ही नहीं हुई थी ! सिवाय मान्यताके और कोई प्रबल कारण है कोई ? अतः माना हुआ न मानो तो मिटा ! मान्यतामें बैठे है तो भगवानकी भी मान्यता ही करनी पड़ेगी ! आप मारवाड़ी भाषा समझते हो तो मुझे मारवाड़ी भाषामें ही बोलना पडेगा ! अंग्रेज भगवानकी मूर्ति बनाते है तो अंग्रेज जैसी ही बनाते है ,बंगाली मूर्तिकार बंगाली जैसी ही बनाता है । कुत्तेका भगवान कुत्ते जैसा ही होगा ! हमारा भगवान हमारे जैसा ही होगा ! कोई M.A. पढ़ा हुआ हो तो भी बालकको सिखायेगा तो A…A….B….B…करना पड़ेगा ही ! अ, आ, इ, ई....बोलना पड़ेगा ! बालककी अवस्था में आकर ही बालकको पढ़ा सकता है, अपनी अवस्थामें रहकर समझा देगा ? चाहे M.A. हो या आचार्य हो ? इस वास्ते गुरुका शिष्यके भीतर अवतार होता है । अवतार मानो उतरना, तब समझा सकता है, नहीं तो कैसे समझा सकता है ? आप जिस भाषा, द्रष्टान्त समझो, वही भाषामें द्रष्टान्त मेरेको कहना पड़ेगा ! नहीं तो कैसे समझोगे ? इस तरह भगवानको प्राप्त कर सकते है । भाव व्यक्त करनेके लिए शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियों है, इसके सिवा हम क्या करें ?
यह परिवर्तनशीलमें अपरिवर्तनशील है, उत्पत्ति-विनाश होता है, उसमें वह ‘है’ रूप से है ही ! साधनाकालमें तो उसका चिंतन करना पडता है; मन, बुद्धि उसमे लगानी पड़ती है । साध्य परिवर्तनशील नहीं होगा, साधन परिवर्तनशील होगा । देखो साधक, साधन और साध्य — यह तीन है । साधक साधना करके साध्यको प्राप्त करता है, तो साधक पहले साधनरूप बनेगा । साधन बनकर फिर साध्यमें मिल जायेगा ! साधक और साधन; दोनों छूट जायेगा ।
श्रोता — जैसे संसारकी मान्यता है, ऐसे ही परमात्माकी मान्यता है ?
स्वामीजी — परमात्माकी मान्यता नहीं है, परमात्मा ‘है’ । आप मान्यता समझो तो आपकी बात है । उस ‘है’ में ही मान्यता होती है । मान्यतामें मान्यता कैसे ठहरेगी ? आप स्वयं हो तो कोई चीज उथल-पुथल कर सकते हो, आप ही नहीं हो तो उथल-पुथल कैसे करोगे ? आप चाहे कितने ही तर्क कर लो, आप बातोंमें मेरेको नहीं जीत सकते हो (हास्य) !!! युक्तिसे बात करो आप । पृथ्वी न हो तो कितना ही चतुर नृत्यकार नाच सकता है क्या ? आधारके बिना कैसे बात चलेगी ? आधारका पता ही नहीं है ? बिना प्रकाश आप देख सकते नहीं, पर आप प्रकाशकी तरफ देखते ही नहीं हो, और सब कुछ देखते हो; उधर ध्यान जाता ही नहीं आपका !
क्षत्रिय विद्यालय कलकत्तामें है, उसमें एकबार जानेका काम पड़ा । एक बालकने कहा कि परमात्मा नहीं है । तो मैंने बोला भाई ! अपनी फ़जीती नहीं करानी चाहिए, बेइज्जती नहीं करानी चाहिए ! क्योंकि आपने सब जगह देख लिया, अनंत ब्रह्माण्डोंमें खोज लिया ? और यदि सब देखा है, जानते हो तो आप ही ईश्वर हो गये ! आप ईश्वर नहीं है, ऐसा कैसे कह सकते हो ? और यदि आप सब जानते नहीं हो, देखा नहीं; तो आपकी बातको मानें वह डबल मुर्ख है ! आप जानते तो हो नहीं, और कहते हो कि ईश्वर है ही नहीं ! आप जानते हो ? उसने कहा — ‘मैं जानता हू’ ! तो तेरे सिरके केश कितने है बताओ ? तो उसने कहा, वह तो आप ही नहीं बता सकते ! तो मैंने कहा कि मैं तो सब जाननेका दम भरता ही नहीं हूँ ! आप कहते हो कि मैं सब जानता हूँ, तो आप पर लागु होगा ! अच्छा यह नहीं सही ! आप इस स्कुलमें छोटेपनसे पढते-पढते बड़े हो गये, बताओ यह स्कुलकी सीढियों कितनी है ? आपने ध्यान ही नहीं दिया है, रोजाना चढ़ते-उतरने पर भी ! जब इतनी स्थूल चीज भी ध्यान दिए बिना नहीं बता सकते, तो परमात्माको कैसे बता सकते हो ?
मेरेको दुःख इस बातका है कि आप जानना चाहते ही नहीं ! इधर द्रष्टि देना चाहते ही नहीं ! आप जान सकते नहीं, ऐसा मैं नहीं कहता हूँ । आप सबलोग जान सकते हो, पर चाहते ही नहीं तो क्या करें आपको ? परिवार नियोजनमें कितना बड़ा भारी नुकसान है, पता ही नहीं ! किसीने मुझे सुनाया कि विदेशोमें बड़े-बड़े बुद्धिमान है, वह भारतीय है । उनका तो आप जन्मना बंद कर देते हो ! भारतीय दर्शन जितना गहरा है, उतना गहरा दर्शन किसी देशका हो तो बताओ ? आपको चेलेंज देता हूँ, खोजके लाओ, मेरेको बताओ ! इतने बुद्धिमानका तो नाश कर देते हो, जन्म ही नहीं लेने देते हो ! थोड़ेसे आरामके लिए कितना नुकसान करते हो । सुखासक्ति ही पतनका मूल कारण है, संतोंकी कृपासे मिली है यह बात मुझको ! यहीं संसारके भोगोमें अटके हो आप, महान पतन होगा । वही सुखके पीछे पड़े हो, क्या दशा होगी देशकी, जनताकी ? महान पतन होगा ।

परमात्मप्राप्ति सरल है
देहिनोऽस्मिन्यथा यथा देहे कौमारं यौवनं जरा, तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति’ — यह संसार नित्य परिवर्तनशील है, बदलता ही रहता है । एक क्षण ही स्थिर नहीं रहता है । तो बदलना बहुत आवश्यक है और बदलनेसे अंत में नाशकी तरफ जाता है । अविनाशी बदलता नहीं और नाशकी तरफ जाता नहीं, अविनाशी ही रहता है । संसारका काम तो बदलनेसे ही होता है और परमात्मतत्वकी प्राप्ति न बदलनेसे ही होती है । वही है जो रहता है । ‘यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं ज्ञास्यसि पाण्डव’, शरीर, विचार, वस्तु बदलती रहती है,यह सब बदलनेवाले है और खतम होनेवाले है । और संसारमें जो अच्छापन है, वह बदलनमें ही है । न बदलनेमें नहीं है, नहीं तो धान, फल, वृक्ष, शरीर भी कैसे होगा ? बिना बदले कैसे होगा फुलमें से फल ? तो इसकी बदलनेसे ही सुंदरता है । और जो बदलता है वह नित्य रह सकता ही नहीं कभी ! क्योंकि ‘नासतो विद्यते भावो, नाभावो विद्यते सतः’ । असत् का भाव विद्यमान नहीं रहता है, नित्य-निरंतर बदलता रहता है और सत् का अभाव नहीं होता है, हो सकता नहीं है । इस आधे श्लोकमें सम्पूर्ण शास्त्रोंका, वेदोंका सार भरा हुआ है, बहुत गहरा भाव भरा हुआ है । सब संसार नाशवान है और स्वयं चेतन, अविनाशी है । यह अविनाशी होकर नाशवानके द्वारा सुख चाहता है, आराम, उन्नति चाहता है; बड़ी भारी गलती करता है । यह कभी होनेवाला नहीं, होगा नहीं, हो सकता नहीं, प्रत्यक्ष बात है । शरीर द्वारा आप कैसे सुखी हो सकते हो ? पदार्थ, भोग, रुपयें द्वारा आप कैसे सुखी हो सकते हो ? आपमें तो परिवर्तन होता नहीं, इसमें तो परिवर्तन ही परिवर्तन है, बिलकुल विरुद्ध स्वाभाव है । आप अपरिवर्तनशील हो तो अपरिवर्तनशील के साथ ही शांतिसे रह सकते हो । परिवर्तनशीलके साथ कैसे आनंद हो सकता है ? असंभव बात है । बहुत सीधी और सरल बात है , विचार करोगे तो आपको साफ दिखेगी, प्रत्यक्ष अनुभव है । आपने कितने ही व्याख्यान,कथा सुनी है, परन्तु कभी ऐसा सुना है कि परमात्म बदलते है ? वे परमात्मा और हो गए है और पहले परमात्म और थे ? कभी किसी शास्त्र, पुराण, मत-मतान्तर, मजहब, धर्ममें सुना है ? वह सब जगह है, और सबका है । जो सबका हो, वही हमारा हो सकता है । किसीका हो और किसीका न हो, वह हमारा नहीं हो; वह हमारा कैसे हो सकता है ? कभी हो और कभी न हो, वह सदा कैसे हो सकता है ? कहीं हो और कहीं न हो, वह सब जगह कैसे मिल सकता है ? आप विचार ही नहीं करते हो, सोचो तो सही ! जिसके लिए भयंकर पाप करते हो वह रहेगा क्या ? गर्भपात जैसे भयंकर पाप करते हो ...राम राम राम ...!!! महान, भयंकर कष्ट पाना पड़ेगा ! सत्संग करनेवाले भी इस बातको समजते नहीं ? गहरा उतरना चाहते ही नहीं ! समझना चाहो तो आपके समझमें बहुत बातें आ सकती है ।
श्रोता — ‘मन्मना भव’ ऐसा कहनेमें भगवानका क्या तात्पर्य है ? ‘मेरे में मन लगा’ तो मेरी कल्पनाके अनुसार ही मन लगाऊंगा ! तो भगवान मेरी कल्पना ही हुए !
स्वामीजी — ‘मेरे में मन लगा’ इसमें आप जो समजो वह सब तात्पर्य है । भगवानको सगुण मानो तो सगुणमें तात्पर्य है, निर्गुण समझो तो निर्गुणमें तात्पर्य है । निराकार, साकार, समझो तो उसीमें तात्पर्य है । परमात्माका कोई भी रूप हो, नित्य है वह ! आपने आज दिन तक जो पढ़ा हो, समझा हो, माना हो; वही रूप, उसीमें मन लगाओ — यह तात्पर्य है । साकार, निराकार, सगुण, निर्गुण वही है, उसमें भेद मानना गलती है ।
परमात्माका जो भी चिंतन किया जायेगा, सब-का-सब कल्पित ही होगा किसीकी भी ताकत नहीं है कि भगवानके असली रूपको पकड़ सकें ! तो हम पकड़ नहीं सकते परन्तु हमारी पकड़में वे आ जाते है ! हम पकड़ नहीं सकते मगर वे पकड़में आ जाता है ! हम साकारको नहीं जानते, पर वो साकार हो सकते है ! हम आँख, कानसे नहीं पकड़ सकते पर वे देखने, सुननेमें आ जाते है; मानो हम उनतक नहीं पहुँच सकते पर वे हमारे तक पहुँच सकते है, वे सर्व-समर्थ है । हम जो भाव रखते है, वे उस भावको स्वीकार कर लेते है । क्योंकि हमारी कमजोरीको वे जानते है । नहीं जानते तो ईश्वर, भगवान कैसे हुए ? ब्रह्म,निराकार ..आदि जोर लगाके कर लो, सिवाय आपकी कल्पनाके कुछ नहीं है । जैसे सगुण माया है, वैसे ही निर्गुण भी माया है । बराबर है, कोई फर्क नहीं है दोनोंमें ! परन्तु हमारा लक्ष्य परमात्मा है, उस लक्ष्यको परमात्मा जानते है और मान लेते है । हम परमात्माका ध्यान करते है तो हम परमात्माको ध्यानसे पकड़ नहीं सकते, परन्तु भगवान हमारे भावको स्वीकार कर लेते है; ‘भावग्राही जनार्दनः’ । जैसे बालक माँको माँ, जननी, मधर; कोई बालक माँको भाभी, मासी, बाई कहता है तो क्या माँ भाई या देवर समझती है क्या ? कोई नाम लेकर बोलता है तो भी माँ समझती है उस बालक के भाव को ! ऐसे सर्व-वित् है भगवान ! भाषा बादमें प्रगट होती है । उसके मन, बुद्धि, प्रेरणामें भाव होते है, उसको परमात्मा जानते है । इस वास्ते हमारा लक्ष्य परमात्मा है, उसीसे हमें परमात्माकी प्राप्ति होती है । प्रकृति परमात्माको नहीं पकड़ सकती है, फिर यह प्रकृतिजन्य यह साकार, सगुण; उत्पन्न और नष्ट होनेवाला कैसे पकड़ सकता है ? पर परमात्मा सब जगह परिपूर्ण है वैसे-के-वैसे ही ! सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटनामें वैसे के वैसे ही है; पर लक्ष्य होनेसे परमात्मा प्राप्त हो जाते है । तो तत्वज्ञान, दर्शन उनकी कृपासे ही होता है — यह सिद्धांत है । मेरेको गीताजीसे बहुत विचित्र बातें मिली है, बड़ा सरल दिखता है । मुझे परमात्मप्राप्ति जितनी सरलतासे, सुगमतासे प्राप्त होती है, ऐसी कोई वस्तु सरलतासे, सुगमतासे प्राप्प्त होती नहीं, हो सकती नहीं, है नहीं ऐसा साफ दिखता है ! इतना सुगम है परमात्मा; ऐसा सुननेसे मन तो करता है पर अपनी जिद छोड़ते नहीं, अब छोड़े बिना कैसे हो ??

साधक कौन है ?
श्रोता — कर्तृत्व ही नहीं है, वह करता ही नहीं है फिर उसके लिए कार्य ही क्या है? उसके लिए करणकी भी क्या आवश्यकता है; पर महाराजजी यह किस स्थितिकी बात है ?
स्वामीजी — जबसे परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिकी इच्छा होती है, तबसे ही यह बात समझ लेनी चाहिये कि परमात्मतत्त्वमें कर्तृत्व नहीं है और करणकी अपेक्षा नहीं है । यह बात पहलेसे ही मान लेनी चाहिए तो उद्देश्य करणनिरपेक्षताका हो जायेगा । करणकी सहायता लेते हुए साधन करते है तो भी उसके ध्यानमें यह आ जायेगी कि वास्तवमें तत्त्व करणनिरपेक्ष है और करणनिरपेक्ष तत्वका साधन भी करणनिरपेक्ष ही है । जबतक असाधन साथमें रहता है तबतक करणसापेक्षता साथमें दिखती है । परमात्मतत्वमें करणकी अपेक्षा नहीं है । ‘निर्द्वन्द्वो ही महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते’; जबतक सत्-असत् का, साधन-असाधनका द्वंद्व रहता तबतक करणकी अपेक्षा रहती है, निर्द्वन्द्व होने पर करण नहीं रहता । अतः वास्तवमें असधानमें ही करणकी अपेक्षा रहती है । मानो उद्देश्य निष्काम भावका होनेसे सर्वथा निष्काम उनके(स्वयं) होनेसे होता है । इस वास्ते लोकमान्य तिलकजी महाराजने कर्मयोग सिद्धपुरुषके द्वारा ही होता है — यह माना है । जबतक सर्वथा कर्मसे सम्बन्ध विच्छेद नहीं होता है; पूर्णता नहीं होती; तबतक निष्कामभावका उद्देश्य रहता है, निष्कामभाव पूरा नहीं रहता परन्तु ‘स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्’ । इसमें यह बात आयी है कि निष्कामभावसे जितना भी अनुष्ठान हो गया उसका फल परमात्मप्राप्ति ही होगी, दूसरा नहीं होगा । क्रिया जीतनी भी है, प्रकृतिमें होती है तो प्रकृतिसे अतीत होनेका पहले उद्देश्य होता है । अतः उद्देश्यमें करणसापेक्षता नहीं रहती पहलेसे ही ! उद्देश्यको ठीक समझ ले तो उसका साधन बढ़िया होगा । नहीं तो कभी सकाम, कभी निष्काम, कभी धन, मान, बड़ाईका उद्देश्य — यह साथमें बनते रहेंगे ।उद्देश्य सांसारिक न रहनेसे ही वह साधक होता है, वरना वह साधक नहीं है । आंशिक साधन तो सबमें रहता है, परमात्माका अंश होनेसे । आज साधन करते है, सत्संग करते है फिर भी उन्नति नहीं होती, कारण क्या है ? साथमें असाधन रहता है ! मानो जूठ-कपट भी कर ले, बेईमानी भी कर ले, ठगी, धोखेबाजी भी कर ले धनके लिए ! और मनमें यह रहता है कि हम बाबाजी थोड़े ही है ! हम तो गृहस्थ है !! हमारे तो यह करना ही पडता है, हमारे तो जरुरी है; तो जबतक यह जरुरी रहता है तबतक वह साधक नहीं होता, सांसारिक आदमी है; भले ही अपने को साधक मान लें ! सत्संग करते है अच्छी बात है, फायदेकी बात है, परन्तु साधक नहीं है । साधक तो वह है, जिसका साधन ही उद्देश्य है । असाधन हो जाय तो चिंता, दुःख होता है, भीतर में जलन होगी । अतः एक-दो बार असाधन हो जाय पर आगे नहीं होगा । उसका उद्देश्य पारमार्थिक है, वह विधिरुपसे कैसे कर सकता है कि जूठ-कपट करना पडता है, हम गृहस्थ है !! तो गृहस्थकी ही मुख्यता रहती है । साधन करते हुए और व्यवहार करते हुए भी संसारकी मुख्यता रहेगी । और साधन करने में तत्पर हो जाने पर मुख्यता साधककी ही रहती है । साधकके उद्देश्यमें साधकपना अखंड रहेगा, मैं साधक हूँ, मैं ऐसे कैसे कर सकता हूँ । सत्संग होने पर असत् का संग रहना नहीं चाहिए, नहीं तो तबतक सत् कर्म है,सत् चिंतन है,सत् चर्चा है !
करणसापेक्षता रहेगी तबतक कर्तृत्व रहेगा और कर्तृत्व रहेगा तबतक भोक्तृत्व रहेगा ही । कर्तृत्व-भोक्तृत्व ही तो संसार है । परमात्मप्राप्ति न गृहस्थको होती है, न साधुको होती है; परमात्मप्राप्ति तो साधक को ही होती है ।साधक न गृहस्थ होता है, न साधु होता है । उसमें न गृहस्थपनेका अभिमान होता है, न साधुपनेका अभिमान होता है ! इसपर सोचो, विचार करो ! नहीं तो तबतक सत्संग एक शुभकर्म है, शुभकर्मसे लाभ है; पर अपनी मुक्ति चाहता है, वह बात कहाँ है ? जैसे एक धन कमानेवाला होता है और एक बेफिक्र होता है कि कभी नुकशान हो जाय,खर्च भी कर दे कभी । तो वह असली लोभी नहीं है ।असली लोभी होगा तो थोडा चल लेगा पर चार पैसे खर्च नहीं करेगा । वह कठिनता सह लेगा पर पैसा खर्च नहीं करेगा ! ऐसे ही साधनका लोभी हो वह असाधन कैसे करेगा ? विचार करते है तो मालूम पडता है कि करणसापेक्ष साधक होता ही नहीं ! तो साधक मात्र करणनिरपेक्ष होता है । प्रायः साधक मन-बुद्धिकी आवश्यकता समझते है और मन-बुद्धिके द्वारा ही साधन करते है । आवश्यकता जडकी समझेंगे तो जडताका त्याग कैसे करेंगे ? उनको करणनिरपेक्षता समझमें आती ही नहीं ! उनको साधनमें सहायक मानता है फिर उनसे सम्बन्ध विच्छेद कैसे होगा ? यह तब होगा कि जब प्रकृतिका सम्बन्ध किसी भी तरह से किन्चित् मात्र भी बाधक है, ऐसा समझने पर ही यह करणनिरपेक्षताकी बात समझमें आएगी । जैसे रथके आगे घोड़े जाते है, घोड़े के आगे लगाम जाती है, उसके आगे सारथी जाता है और महलमें तो रथी स्वयं ही जाता है, क्रम है यह ! इस तरहकी करणनिरपेक्षताकी बात शास्त्रोमें भी विस्तार से आयी है । इसलिए साधक पहलेसे ही उद्देश्य करणनिरपेक्षताका रखें ।
नारायण..... नारायण......... नारायण........... नारायण.............. नारायण