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हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥ हे नाथ मैँ आपको भूलूँ नही...!! हे नाथ ! आप मेरे हृदय मेँ ऐसी आग लगा देँ कि आपकी प्रीति के बिना मै जी न सकूँ.

Friday, April 12, 2013

रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः


राम वन्दना
आपदामपहर्तारं दातारां सर्वसम्पदाम्।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो-भूयो नामाम्यहम्॥१॥

रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय मानसे।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥२॥

नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम।
पाणौ महासायकचारूचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम॥३॥

रामावतार

भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥१॥

लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥२॥

कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता॥३॥

करुना सुखसागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता॥४॥

ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै॥५॥

उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥६॥

माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा॥७॥

सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा॥८॥

श्री राम स्तुति

श्रीरामचंद्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणं |
नवकंज-लोचन, कंज-मुख, कर-कंज पद कंजारुणं ||


हे मन! कृपालु श्रीरामचंद्रजी का भजन कर | वे संसार के जन्म-मरणरूप दारुण भय को दूर करने वाले हैं, उनके नेत्र नव-विकसित कमल के सामान हैं, मुख-हाथ और चरण भी लाल कमल के सदृश हैं |

कंदर्प अगणित अमित छबि, नवनील-नीरद सुंदरं |
पट पीत मानहु तड़ित रूचि शुचि नौमी जनक सुतावरं ||

उनके सौन्दर्य की छटा अगणित कामदेवों से बढ़कर है, उनके शरीर का नवीन नील-सजल मेघ के जैसा सुन्दर वर्ण है, पीताम्बर मेघरूप शरीरों में मानो बिजली के सामान चमक रहा है, ऐसे पावन रूप जानकी पति श्रीरामजी को मैं नमस्कार करता हूँ |

भजु दीनबंधु दिनेश दानव-दैत्यवंश-निकन्दनं |
रघुनंद आनँदकंद कोशलचंद दशरथ-नन्दनं ||

हे मन ! दीनों के बन्धु, सूर्य के सामान तेजस्वी, दानव और दैत्यों के वंश का समूल नाश करने वाले, आनंदकंद, कोशल-देशरूपी आकाश में निर्मल चंद्रमा के सामान दशरथनंदन श्रीराम का भजन कर |

सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अंग विभूषणं |
आजानुभुज शर-चाप-धर, संग्राम-जित-खरदूषणं ||

जिनके मस्तक पर रत्न-जटित मुकुट, कानों में कुंडल, भाल पर सुन्दर तिलक और प्रत्येक अंग में सुन्दर आभूषण सुशोभित हो रहे हैं, जिनकी भुजाएँ घुटनों तक लम्बी हैं, जो धनुष-बाण लिए हुए हैं, जिन्होंने संग्राम में खर-दूषण को जीत लिए है -

इति वदति तुलसीदास शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजनं |
मम ह्रदय-कंज निवास कुरु, कामादि खल-दल-गंजनं ||

- जो शिव, शेष, और मुनियों के मन को प्रसन्न करने वाले और काम, क्रोध, लोभादि शत्रुओं का नाश करने वाले हैं; तुलसीदास प्रार्थना करते हैं की वे श्री रघुनाथजी मेरे हृदयकमल में सदा निवास करें |

मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुन्दर साँवरो |
करुना निधान सुजान सीलू सनेहु जानत रावरो ||

जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही स्वभाव से ही सुन्दर सांवला वर (श्रीरामचन्द्रजी) तुमको मिलेगा | वह दया का खजाना और सुजान (सर्वज्ञ) है, तुम्हारे शील और स्नेह को जानता है |

एहि भाँति गौरी असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली |
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली |

इस प्रकार श्रीगौरीजी का आशीर्वाद सुनकर जानकीजी समेत सभी सखियाँ ह्रदय में हर्षित हुईं | तुलसीदासजी कहते हैं - भवानीजी को बार-बार पूजकर सीताजी प्रसन्न मन से राजमहल लौट चलीं |

जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि |
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ||

गौरी जी को अनुकूल जानकर सीता जी के ह्रदय में जो हर्ष हुआ वह कहा नहीं जा सकता | सुन्दर मंगलों के मूल उनके बायें अंग फड़कने लगे |
 जय जय सुरनायक

जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता।
गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधुसुता प्रिय कंता।।

पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई।
जो सहज कृपाल दीनदायल करउ अनुग्रह सोई।।

जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा।
अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा।।

जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगत मोह मुनिबृंदा।
निसि बासर ध्यावहिं गुनगुन गावहिं जयति सच्चिदानंद।।

जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा।
सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा।।
जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा।।
मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुर जूथा।।

सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहिं जाना।
जेहि दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना।।

भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा।
मुनि सिद्धि सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पदकंजा।।

जानि सभय सुरभूमि सुनि बचन समेत सनेह।
गगनगिरा गंभीर भइ हरनि सोक संदेह।।

रक्ताम्भोजदलाभिरामनयनं पीताम्बरालंकृतम्
श्यामांग द्विभुजं प्रसन्नवदनं श्रीसीतया शोभितम्।
कारुण्यामृसागरं प्रियगणैर्भ्रात्रादिभिर्भावितं

वन्दे विष्णुशिवादिसेव्यमनिशं भक्तेष्टसिद्धिप्रदम्।।

Thursday, April 11, 2013

ॐ नमो राम राघवाय नम


गुरु ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुदेव महेश्वर:
गुरु साक्षात्परब्रह्म तस्मैश्री गुरुवे नम:।।
|| नमो राम राघवाय नम ||
ॐ रामाया राम भद्राय रामच्न्द्राया मानसा
रघुनाथाया नाथाय सिताये पतिये नम

एक भरोस एक बल एक आस विश्वास
एक रामघन हेतु चातक दास
सिया राम मय सब जग जानी, करहुं प्रणाम जोरी जुग पानी।
हरि व्यापक सर्वत्र समाना, प्रेमते प्रगट होहिं मैं जाना।
 हरि अनंत हरि कथा अनंता
 जाकि रही भावना जैसी। हरि मूरति देखी तिन तैसी।
प्रेम अमिय मन्दर विरह भरत पयोधि गँभीर।
मथि प्रगटे सुर साधु हित कृपासिन्धु रघुबीर।।
बिस्व भरण-पोषण कर जोई।  ताकर नाम भरत अस होई।।
गई बहोर गरीब नेवाजू।  सरल सबल साहिब रघुराजू।।
जपहि नामु जन आरत भारी।  मिटाई कुसंकट होहि सुखारी।।
नमो भगवते वासुदेवाय
ओम नमः शिवाय
कैलाशी काशी के वासी अविनाशी मेरी सुध लीजो।
सेवक जान सदा चरनन को अपनी जान कृपा कीजो॥
तुम तो प्रभुजी सदा दयामय अवगुण मेरे सब ढकियो।
सब अपराध क्षमाकर शंकर, सबकी की विनती सुनियो॥

या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेणसंस्थिता।
नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनम:।।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति:II

स्वामी रामसुखदास जी महाराज

हे नाथ मैँ आपको भूलूँ नही...!! हे नाथ ! हे नाथ मैँ आपको भूलूँ नही...!!
आप मेरे हृदय मेँ ऐसी आग लगा देँ कि आपकी प्रीति के बिना मै जी सकूँ.

ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुख राशि
!! श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेवाय !!

शांताकरम भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णँ शुभांगम।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगभिर्ध्यानिगम्यम। वंदे विष्णु भवभयहरणम् सर्वलोकैकनाथम॥

हनुमान जी के नाम

हनुमान, अंजनी सुत, वायु पुत्र, महाबल, रामेष्ठ, फाल्गुण सखा, पिंगाक्ष, अमित विक्रम, उदधिक्रमण, सीता शोक विनाशन, लक्ष्मण प्राण दाता, दशग्रीव दर्पहा

रामायण के माहा चरित्र

रामायण को हिंदूवर्ग के लोगो दुआरायक पूज्येनीय ग्रन्थ है! कुछ विद्वान् इस ग्रन्थ को काल्पनिक कथाओ का संग्रह मानते है! पहली बात तो यह है की अगर इतना बड़ा समुदाय इस ग्रन्थ की सत्त्यता को मानते है ! तो उनेह किसी के भी विचार से विचलित होने की जरुरत नही है! लोग भले ही इसे एक काल्पनिक ग्रन्थ माने पर वह भी इसके द्वारा अपने जीवन मे कुछ लाभ कमा सकते है !


१.मार्यादा पुरशोतम श्री राम :- श्री राम रामायण के महानायकऔर महापात्र है! जिन्होंने कई आदर्शो को अपने जीवन मे उतारकर एक सादारण मनुस्य की भांति जीवन मे आने वाले हर सुख दुःख को अपना कर एक पुत्र ,भाई ,पति ,मित्र ,शिष्य ,सम्बन्धी,युवराज,राजा,आदि सभी मे आपना कर्म करके सभी के सामने यह उदहारण दिया है की स्वंम भगवान् को भी कर्म से मुक्ति नही है और उनेह भी दुखो -परेसनियो का सामना करना पड़ता है ! तो आम आदमियों की तो बहुत छोटी बात है !


२.सीता:-प्रभु श्री राम जी की भार्या सीता है ! जिनका चरित्र समस्त भारतीय महिलाओ के लिए आदर्श है ! क्योकि माता सीता जी ने महलो का सुख छोड़ कर अपने पति के साथ जंगलो मे जाना स्वीकार किया और हमेशा पतिव्रत धर्म का पालन किया !


३.दशरथ:-श्री राम प्रभु के पिता होने का गोरव सूर्यवंशी महाराज दसरथ जी को प्राप्त हुआ है!दसरथ जी ने अपने चरित्र मे आदर्श महाराजा ,पुत्रोको प्रेम करने वाला पिता,और अपने वचनों की प्रति पूर्ण समर्पित थे!और अनुचित होते ही भी अपने वचनों पालन किया ! जिससे यह सिख मिलती हे की बिना सोचे किसी भी प्रकार का वचन नही देना चाहीऐ यह सर्वथा अनुचित है !
४.लछमन :- श्री राम प्रभु के अनुज होने के साथ ही राम जी का विशेष स्नेह प्राप्त है !लछमन जी को आदर्श भाई होने का गोरव प्राप्त है और यह भी कहा जाता है की राम दुबारा जनम ले सकते है परंतु लछमन जेसा भाई दुबारा नही हो सकता है !कियोकी इनके जीवन का एकमात्र लाछ्य श्री राम की सेवा मे समर्पित कर समस्त सुखो को त्याग कर हमेशा राम जी का साथ दिया !
५.भरत :-भरत जी चरित्र आदर्सो से परिपूर्ण था और वह भी राम जी के के प्रति पूर्ण समर्पण भाव से प्रेम करता था इसिलीय जो राज उसे अपनी माँ की कुटिलता के कारन प्राप्त हुआ पर उसने राज पाठ न अपना कर भगवान् श्री राम की चरण पादुका को सिहासन आरुढ कर स्वम उनके प्रतिनिधि के तोर पर राज की देख भाल की जो भरत के महान चरित्र को दर्शाती है !
६.शत्रुघन :-इन्होने भी लछमन के समान ही भरत की सेवा और श्री राम जी की आराधना की !
७.हनुमान :-हनुमान जो श्री राम के सबसे बडे भक्त है !हनुमान जी ने अपनी जीवन राम जी की सेवा भक्ति मे ही समर्पित किया है !वेसे हनुमान जी काफी कथा प्रचलित हे परन्तु इनकी सबसे बड़ी ख़ास बात है की निस्वार्थ भक्ति और सेवा भाव!
जय श्री राम